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आखिर इमानदार टेक्स पैयर्स कौन है, कैसे तय होगा ?

मोदी के भाषण के दोनों पहलू
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Income tax department

आयकर विभाग के मुलाजिमों को ही यह तय करना होता है। जहां तक आयकर विभाग का मसला है तो विभाग को इस बात से कोई लेना देना नहीं होता कि किसने कहां से पैसा कमाया है। उसका तो यही उसूल है कि कमाया है तो इनकम टैक्स चुकाओ।

हमारे देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को देश की जनता को ह संबोधित करते हुए ईमानदार आयकर दाताओं की जमकर पैरवी करते हुए उन्हें पूरे सम्मान से नवाजने की बात कही। टेक्स टेरेरिज्म खत्म करने की बात की। और भी बहुत सी बातें कीं। लेकिन ज्यादातर बातें गले उतरते नहीं दिख रहीं उनकी कई बातों से अर्थ की जगह अनर्थ निकाले जा रहे हैं। 
उनकी बातों से क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं दिखती देश की आजादी से पहले और आजादी के बाद अभी तक आयकर विभाग बेइमान आयकर चोरों के साथ ईमानदार आयकरदाताओं को परेशान करता आया है? उन्हें वांछित सम्मान भी नहीं देता था, लेकिन अब अगर मोदी ईमानदारी से आयकर अदा करने वालों को सम्मानित करने की बात कर रहे हैं तो सवाल यही है कि कोई आयकरदाता ईमानदार है नहीं है, इसे कौन तय करेगा? 
जाहिर सी बात है कि यह आयकर विभाग के मुलाजिमों को ही यह तय करना होता है। जहां तक आयकर विभाग का मसला है तो विभाग को इस बात से कोई लेना देना नहीं होता कि किसने कहां से पैसा कमाया है। उसका तो यही उसूल है कि कमाया है तो इनकम टैक्स चुकाओ। जिस स्लैब में आता है उसके हिसाब से दो।
देश के ईमानदार आयकर दाताओं की बात करते हुए मोदी जी ने यह भी उल्लेख किया कि आयकर जैसा प्रत्यक्ष कर देने वाले लोगों की तादाद देश की कुल आबादी का डेढ़ फीसदी ही है। तो क्या माना जाए कि देश में इनकम टैक्स चोरी करने वालों का बड़ा प्रतिशत है? या यह कि इन डेढ़ फीसदी टेक्स चुकाने वालों में भी कम टेक्स देकर कर चोरी करने वाले लोग भी शरीक हैं? सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि देश में मात्र डेढ़ फीसदी लोग ही क्यों आयकर देते हैं? बाकी के लोग भुख्खड़ हैं? चोर हैं? या फिर सरकार की टैक्सेशन पालिसी में कोई खोट है? या ऐसी नीतियां हैं जिनके चलते लोग टेक्स चोरी को मजबूर हैं? कारोबार की दुनिया के लोगों को पता है कि काले धन को गोरा कैसे किया जाता है। कागज पत्र तैयार करने में पंद्रह फीसदी पैसा खर्च करो और काले को गोरा बनाने की कला में निपुण खिलाड़ियों की भरमार है।

कमाई का दायरा क्या होना चाहिए ?

मोदी जी क्या ऐसा नहीं लगता कि देश में टेक्स स्लैब ज्यादा तीस फीसदी होने के कारण लोग पंद्रह फीसदी रकम खर्च करके इनकम टैक्स से निजात पा लेते हैं? क्या हम दस लाख से अधिक की कमाई वाले लोगों पर सीधे दस फीसदी और इससे ज्यादा वालों को अधिकतम बीस फीसदी स्लैब के दायरे में नहीं ला सकते? फिर एक सवाल यह भी कचोटता है। आपकी ही सरकार ने पहली बार देश के सभी वर्गों के गरीबों को आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला लिया और उसे लागू भी क्या। आपकी सरकार ने ही गरीबी का पैमाना तय करते आठलाख की सालाना इनकम वालों को आरक्षण के लिए पात्र माना। लेकिन जब आठ लाख सालाना कमाने वाले गरीब हैं तो फिर उनसे पांच लाख से ज्यादा की आय के बाद आयकर क्यों वसूला जाता है? 

दूसरे देशों की तुलना में भारत में काम है टैक्स की दर 

आठ लाख की सालाना आय वालों को आयकर से मुक्त क्यों नहीं करना चाहिए? इसमें कोई शक नहीं है भारत उन मुल्कों में शामिल हैं जहां आयकर वसूली के स्लैब काफी कम है। अमेरिका जैसे देशों में चाली फीसदी से ज्यादा टेक्स वसूला जाता है। लेकिन अमेरिकी सरकार इन टेक्स पैयर्स को घाटा होने पर उनके व्दारा पूर्व में चुकाए गए आयकर में से पैसा भी लौटाती है। क्या मोदी इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि दस साल से टेक्स चुकाने वाला घाटे में आ जाए तो आयकर विभाग उसको भी घाटे की भरपाई करेगा? मोदी जी जैसे मजबूत साख वाले नेता से लोग ठोस आयकर सुधारों की उम्मीद करते हैं। कोई उनसे यह अपेक्षा कतई नहीं करता कि बातों के झुनझुने से उसका मन बहलाया जाए? ऐसी बातों से मोदी जी की प्रतिष्ठा घटती है, इसलिए उनके जैसे नेताओं को तारीफ बटोरने के साथ गलतियों के लिए आलोचना सहने और सुधार करने के लिए भी तत्पर और तैयार होना चाहिए।