HomeNationalOpinion

ऐतिहासिक एवं साहसिक निर्णयों से कश्मीर में लौटती कश्मीरियत

डीएवीपी विज्ञापन रैट में 50% का इजाफा और प्रिन्ट मिडिया बजट में 100 फिसदी की बढोतरी करे सरकार-INS
देश में 5,609 COVID-19 के नए मामले,132 मौतें
ASI को वियतनाम में मंदिर पुनरुद्धार के दौरान 9 वीं शताब्दी का शिवलिंग मिला
Dal Lake Srinagar

कश्मीर अब तक राजनीतिक उदासीनता और ऐतिहासिक भूतों की एक पंक्ति की तरह था जिसे अब दुनिया ऐतिहासिक सामर्थ्य के प्रकाश स्तम्भ के रूप में देखेगी। अभिनव गुप्त की यह भूमि अभिनव समृद्धि का उदाहरण बनेगी, जहां एक बार फिर कल्हड़ की राजतरंगिणी का आदर्श आत्मनिर्भर भारत का आत्म विश्वास बन प्रकट हो सकेगा।


भारतीय इतिहास, संस्कृति और वांग्मय में जिस कश्मीर का चित्रण धरती के अविरल नैसर्गिक सौंदर्य के रूप में किया है, यह विडम्बना ही है कि उसी कश्मीर को आजाद भारत की लगभग दो पीढ़ियों ने एक राजनैतिक-सामरिक मुद्दे के रूप में ही पढ़ा और जाना। देश की स्वतंत्रता के साथ ही अप्रत्याशित रूप से अखंड भारत की ऐतिहासिक एवं उद्विकासीय अवधारणा ने अपना समसामयिक अर्थ खो दिया। जिसे बाद के दिनों में एक बड़ी त्रासदी के रूप में महसूस किया जाने लगा था। इसी त्रासदी से मुक्ति के प्रयास के रूप में उसे राजनीतिक आधारों पर पुनः नियोजित करने की ऐतिहासिक अनिवार्यता महसूस की गई। संदेह, ब्रितानी हुकूमत ने अपने विभाजनकारी एवं औपनिवेशिक-राजनैतिक विचारों के विस्तार के तहत भारत-विभाजन की जो पटकथा लिखी थी, उसके समक्ष तत्कालीन राजनीतिक सत्ता विमर्श एवं नेतृत्व हत-प्रभ नजर आया। उक्त पटकथा को चुनौती देने की आधी-अधूरी कोशिशों के साथ उसको अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने के क्रम में भारत राजनीतिक रूप से विफल रहा। जिसका खामियाजा भारत सहित इस उपमहाद्वीप ने बरसों से भुगता है।

भड़काऊ राजनीती नागरिकों के विकास में बाधक बनी 

धारा-370 की राजनीतिक संकल्पना ने भारत के साथ कश्मीर के नैसर्गिक सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव को खत्म करने का प्रयास किया। इस प्रावधान में जहां एक ओर सम्प्रभु राष्ट्र-राज्य की वैचारिक आयोजना को खारिज किया। दूसरी ओर, वहां के आम नागरिकों के स्वाभिमान, सामर्थ्य और स्वीकार्यता को कभी जगह नहीं दी गई। इस दृष्टि में यह मानव इतिहास की एक क्रूरतम राजनीतिक प्रक्रिया थी जो अपने नागरिकों के साथ साथ राष्ट्र की स्वाभाविक गरिमा के प्रतिकूल थी। जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले और सबसे जोरदार ढंग से इन अस्थायी किंतु विशेष प्रावधानों का विरोध किया था।
5 अगस्त, 2019 को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति और राज्य का दर्जा रद्द करते हुए, इन दोनों अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधानों (अनुच्छेद-370 एवं 35 ए ) को समाप्त कर दिया। इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के ऐतिहासिक एवं साहसिक निर्णय के साथ राज्य के नागरिकों को सामाजिक-राजनीतिक आर्थिक-शैक्षिक अधिकारों से सम्पन्न किया। सीखने एवं सिखाने के इस आनंदमयी एवं स्वतंत्रतापूर्ण परिवेश की कल्पना को यथार्थ में बदलने के लिए अनुच्छेद-370 को रद्द करना एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। यह एक ऐसा निर्णय है जिसकी उपलब्धियों को न सिर्फ तात्कालिक भौतिक समृद्धि से समझा जा सकता है, बल्कि यह बहु प्रतीक्षित भारतीय स्वत्व-बोध की एक सांस्कृतिक अनुगूंज भी है।

केन्द्र की योजनाओं पर कश्मीर को प्राथमिकता 

‘आयुष्मान भारत’ मिशन के तहत स्थापित स्वास्थ्य एवं लोक कल्याण केंद्रों (HWC) की संख्या पिछले एक वर्ष में डबल हो गई मतलब इनकी कुल तादाद बढ़कर 717 हो चुकी है। इसके अलावा जुलाई 2019 से जुलाई 2020 के बीच राज्य में कुल 478 (310 SHC, 157 PHC और 11 UPHC) अतिरिक्त स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र स्थापित किए हैं, जिनमें दवा एवं निदान सहित सभी सेवाएं मुफ्त प्रदान की जा रही हैं। असर-2012 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में प्रारम्भिक शिक्षा की स्थिति चिंताजनक थी, राज्य में सरकारी शिक्षा मित्र लगातार कमजोर हो रहा था और निजी विद्यालय एवं मदरसों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद् (2017 ) के अनुसार कश्मीर में सर्वाधिक निजी शिक्षा-संस्थानों की संख्या बढ़ी है (61%), जो शेष भारत से ज्यादा है। किन्तु इन केंद्र शासित प्रदेशों की शैक्षिक स्थिति की तात्कालिक अनिवार्यताओं के संदर्भ में शिक्षा मंत्री, भारत सरकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने स्वयं इन केंद्र शासित प्रदेशों का दौरा किया। जो इन 1. क्षेत्रों की आगामी नीतियों के लिए पाथेय सिद्ध होगा।
इस क्षेत्र की महिलाएं अपने कई संवैधानिक अधिकारों से वंचित थी। आज वे सही मायने में अधिकार सम्पन्न है, गैर-निवासी से विवाह के उपरांत भी उनका सम्पति का अधिकार सुरक्षित है।

आत्मनिर्भर भारत बनाने में बड़ी भूमिका 

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य विधि का अनुकूलन)आदेश-2020, केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2020 को अधिसूचित कर दिया था। जिसके तहत पूर्व-प्रचलित 109 कानूनों में आंशिक संशोधन और 29 कानूनों को पूर्ण रूपेण निरस्त किया है। जिसका लाभ इस क्षेत्र के अधिवासी’ (पूर्व में निवासी) को मिलेगा। अब यह अधिवासी जम्मू-कश्मीर के शिक्षण संस्थानों में प्रवेश, सभी प्रकार की सेवाओं, नौकरियों में भागीदारी कर सकेंगे और घर, जमीन-जायदाद आदि किसी को भी बेच और खरीद सकेंगे। कश्मीर अब तक राजनीतिक उदासीनता और ऐतिहासिक भूलों की एक पंक्ति की तरह था जिसे अब दुनिया ऐतिहासिक सामर्थ्य के प्रकाश स्तम्भ के रूप में देखेगी। 
अभिनव गुप्त की यह भूमि अभिनव समृद्धि का उदाहरण बनेगी, जहां एक बार फिर कल्हण की राजतरंगिणी का आदर्श आत्मनिर्भर भारत का आत्मविश्वास बन प्रकट हो सकेगा वर्तमान सरकार की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि अब वह कश्मीर के बदले हुए राजनैतिक एवं सामाजिक हालातों को राष्ट्रीय एवं वैश्विक विकास की मुख्यधारा के साथ जोड़े। साथ ही इस दिशा में पिछले एक वर्ष से चल रही प्रगतिगामी योजनाओं को स्थानीय प्रतिबद्धताओं के साथ विस्तारित करे। इन्ही सद्प्रयासों से ही हासिल किए गए समृद्धि और सशक्तीकरण के बल पर एक दिन काश्मीरी स्वयं किसी भी तरह के राजनैतिक सांस्कृतिक एवं वैचारिक अलगाववादी उपनिवेशीकरण को अस्वीकार करेंगे।