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देश की सुरक्षा के लिए राफेल या देश की जन भावनाओं पर राजनीति कितनी सही

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चीन की भारतीय सीमा में घुसपैठ के लगातार दावों और राजनीतिक कैरियर के दांव पर लग जाने की परवाह किए बगैर राहुल गांधी 'सच की राह पर चलते हुए एक बार फिर रा

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Rafel fighter jet

चीन की भारतीय सीमा में घुसपैठ के लगातार दावों और राजनीतिक कैरियर के दांव पर लग जाने की परवाह किए बगैर राहुल गांधी ‘सच की राह पर चलते हुए एक बार फिर राफेल को लेकर मोदी पर हमलावर हो उठे हैं। जब पूरा देश राफेल के फेर में चीन को सबक सिखाने की उम्मीद लगा रहा है, राहुल गांधी राफेल की कीमतों को लेकर मोदी के खिलाफ फिर चौकीदार चोर है वाला नैरेटिव बनाने की कोशिश में जुट गए हैं। यह जानते हुए भी कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चौकीदार चोर है, और अनिल अंबानी को एचएएल से छीनकर काम क्यों दिया के आरोपों को जनता सिरे से ठुकरा चुकी है। 

राहुल गांधी को कौन समझाएगा कि काठ की हांडी जब पहले प्रयास में परवान नहीं चढ़ी तो अब क्या चढ़ेगी। कांग्रेस के दूसरी और तीसरी पांत के ज्यादातर नेता इस बात को समझ रहे हैं और वह चीन के मुद्दे से लेकर राफेल पर सवालिया निशान खड़ा करने के बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें जमीनी हकीकत और जनता की नब्ज का अंदाजा है। लेकिन राहुल गांधी सरीखे नेता जो अपने बैंक ऑफिस में जेएनयू के पार्ट टाईमर सलाहकारों के भरोसे हैं उनसे यही उम्मीद की जा सकती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह भी उनकी राह पर चलते हुए राफेल को लेकर सवाल कर रहे हैं। चीन ने मई में गलवान घाटी में घुसने के बाद कुछ कदम पीछे हटाए लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि वह अब भी भारतीय भूभाग से सटे कुछ इलाकों और बफर जोन में डेरा डाले बैठे हैं। यह बात पता होने का दावा राहुल गांधी कर रहे हैं तो नरेंद्र मोदी, अमित शाह या रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हैं। भारत सरकार की तरफ से पूरी शिद्दत से कोशिशें जारी हैं कि चीन मई के पहले वाली पोजिशन तक पीछे हटे। लेकिन भारतीय भूमि पर चीनी कब्जे की बात कहके राहुल बाबा देश के प्रधानमंत्री से आधिकारिक तौर पर क्यों कबूल करना चाहते हैं?
क्या राहुल भूल गए कि 1948 में भारतीय फौजें जब पाकिस्तानी सेना को कश्मीर से लगभग खदेड़ चुकी थीं, तभी तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की शिकायत करके पूरा केस ही खराब नहीं कर दिया था। नेहरू दो दिन नहीं बोलते तो भारतीय सेना संपूर्ण कश्मीर को वापस अपने कब्जे में ले लेती और आज पाक अधिकृत कश्मीर जैसा कोई शब्द विश्व के भूगोल पर नहीं होता। गौरतलब है कि नेहरू की शिकायत करते ही संयुक्त राष्ट्र ने जो जहां है वहीं रहे वाला फरमान जारी कर दिया जिसके चलते पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर के लोगों पर दोयम दर्जे का व्यवहार करता है और पीओके की जमीन का कुछ हिस्सा भी उसने चीन को दे दिया। पीओके लेने और अक्साई चीन को अपना बनाने के भारत सरकार के इरादों के बाद से ही चीन ने भारत के साथ इस तरह की हरकतें करना शुरू कर दिया है। 
राहुल गांधी के नरेंद्र मोदी से मतभेद हो सकते हैं उनके ही नहीं मेरे जैसे कईयों के हो सकते हैं, लेकिन जब बात देश की अस्मिता की आती है तो हमें देश के नेतृत्व का साथ देना चाहिए या फिर असमायिक सवाल खड़े करके उसको कमजोर करके परोक्ष रूप से दुश्मन को फायदे पहुंचाने के काम करना चाहिए? राहुल गांधी ने तो कह दिया कि चाहे उनका कैरियर बर्बाद हो जाए लेकिन भारत की जमीन पर चीन के कब्जे का सच बोलने से नहीं रूकेंगे। शुक्र है कि लोग राहुल गांधी से यूपीए सरकार-2 के दौरान हुए कई कड़वे सच उगलने को नहीं कह रहे हैं। राहुल गांधी को अपने कैरियर को लेकर बेशक आत्मघाती होने का हक है, लेकिन क्या वे अपने साथ कांग्रेस के नेताओं की दूसरी और तीसरी पांत के युवा नेताओं के भविष्य को अंधेरे में नहीं धकेल रहे? क्या देश की सबसे बड़ी पार्टी होने का दंभ भरने वाली कांग्रेस की रीति नीति और कार्यशैली के चलते राजनीति की मुख्यधारा से दूर नहीं हो रही है? 
ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट ने तो अपनी राह ढूंढ ली है। लेकिन मिलिंद देवड़ा, जतिन प्रसाद, आरपीएन सिंह नेता क्या करेंगे? मध्यप्रदेश की बात की जाए तो जयवर्धन सिंह, जीतू पटवारी, कुणाल चौधरी, रजनीश सिंह,तरूण भनोत, प्रियव्रत सिंह, मीनाक्षी नटराजन, नकुलनाथ जैसे युवा नेताओं की पीढ़ी का क्या होगा जिनके लिए कांग्रेस ही सब कुछ है? बात सिर्फ नेताओं के भविष्य तक सीमित नहीं है, लोकतंत्र के भविष्य और उसके सेहतमंद बने रहने के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है जो जनता की आवाज बनकर उभरे न कि जन भावनाओं के खिलाफ बात करे।

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