HomeOpinion

हमारे लिए गंगा का महत्व क्या होना चाहिए

चीन की मंशा समझकर बढ़ाने होंगे अपने कदम
Bhopal Station पर खुलेंगे खानपान के स्टॉल, समोसा-कचौड़ी नहीं मिलेंगी
CM शिवराज सुबह नरोत्तम के घर पहुंचे, मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें तेज
Ganga river

गंगा के प्रति लोगों में अपार श्रद्धा है। श्रद्धालुओं द्वारा गंगा की पूजा माता के रूप में की जाती है। गंगा के स्पर्श से पाप धुल जाते हैं। गंगा जी या उनके तट पर किया हुआ यज्ञ, दान, जप, तप, तर्पण, श्राद्ध और देवपूजन फलदायक होता है। पूजा में बासी गंगाजल वर्जित नहीं है। भव बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए गंगाजल घरों में रखा जाता है। मरणासन्न अवस्था में आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए गंगाजल एवं तुलसीदल मुख में सद्भावनापूर्वक डाला जाता है। जिनके पापों का प्रायश्चित भी असंभव है, उनको भी गंगा जल के सेवन से सुख और शांति का अनुभव होता है। गंगा-स्नान के नियम और व्रत से धन-सम्पत्ति और यश उपलब्ध होता है। जो सैकड़ों योजन दूर से भी गंगा-गंगा’ का शब्द उच्चारण करता है, वह अनेक पापों से मुक्त हो विष्णु लोक को जाता है।

युग-युगान्तर से सनातन धर्मी हिन्दुओं का संशयहीन विश्वास रहा है कि गंगा जल सर्वथा पवित्र है। उसमें किसी भी मलिन वस्तु के सम्पर्क से मलिनता नहीं आती, वरन् जिस वस्तु से उसका संपर्क हो जाता है, वह निश्चित रूप से पवित्र और शुद्ध हो जाती है। भारत की प्राचीनतम सभ्यता व संस्कृति ने जिस किसी भी विषय का धार्मिक गुणगान किया है, उसमें सदैव ही लोक-हित का रहस्य अवश्य रहता है। 
विदेशी विशेषज्ञों के शोध-निर्णय पर उतना आश्चर्य नहीं है, जितना आश्चर्य अपने महामनीषी, महर्षियों की अद्भुत ज्ञानमयी दृष्टि पर होता है। गंगा के जिस पानी की धारा में मुर्दे, हड्डियां आदि दूषित वस्तुएं बह रही हैं, वहीं कुछ फीट नीचे का गंगा जल पूर्ण शुद्ध रहता है। गंगोत्री से समुद्र तक के मार्ग में कितने ही नदी-नाले गंगा जी में प्रविष्ट होते हैं, किन्तु गंगा के जल का अलौकिक गुण गंगोत्री से गंगासागर तक अक्षुण्ण बना रहता है गंगाजल वर्षों तक रखे रहने पर भी दूषित नहीं होता, जबकि अन्य सभी नदियों का पानी कुछ ही समय में खराब और दुर्गन्धयुक्त हो जाता है।
गंगा जल को गर्म करना दोष माना गया है। प्रज्ञा और प्रतिभा देने वाले गंगाजल की महिमा तो है ही, साथ ही आयुर्वेद की दृष्टि से शरीर की स्वास्थ्य के अनंत गुणों का अनुभव भी हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले कर लिया था। संक्रामक रोगों को नष्ट करने में गंगा जल सर्वश्रेष्ठ है। गंगोदक में रक्त बढ़ाने और कीटाणु नाश करने की आश्चर्यजनक सामर्थ्य है। गंगाजल पीने से अजीर्ण, जीर्ण-ज्वर, संग्रहणी, राजयक्ष्मा, तपेदिक, कुष्ठ आदि रोग नष्ट हो जाते हैं। गंगा में स्नान करने से मस्तक के तथा चर्म रोग अच्छे हो जाते हैं । आर्थिक दृष्टि से गंगा हमारी बहुमूल्य निधि है। संसार के ईश्वर भूखंडों में गंगा का कछार ही सर्वश्रेष्ठ है। कृषि कर्म का श्रीगणेश गंगा की घाटी में ही हुआ था। गंगा की रेत में तरबूज, तरबूज और लड़कियां होती हैं। जंगलों की लकड़ी और काष्ठ गंगा की वेगवती धारा से संचालित होते हैं, जिससे श्रम एवं अर्थ दोनों की बचत होती है। गंगा की राह हमारा व्यापार चला और गंगाजी के तीर पर हमारे नगर खड़े हुए।
गंगा की पवित्रता एवं अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अन्य सम्प्रदायों ने भी स्वीकार किया। रहीम, रसखान, ताज और मीर की हृदय-स्पर्शी रचनाएं इसकी साक्षी हैं। सुल्तान मुहम्मद तुगलक, बादशाह अकबर और कट्टरपंथी सम्राट औरंगजेब के लिए खाने-पीने की सामग्री के साथ गंगा का जल भी रहता था। महर्षि वाल्मीकि, आदि शंकराचार्य, कालिदास, कात्यायन, पतंजलि, चाणक्य, सूरदास, तुलसीदास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महाकवि पद्माकर, राजदूत मेगस्थनीज, चीनी पर्यटक ह्वेनसांग और ऐसे ही अनेकानेक महापुरुषों ने गंगाजी की स्तुति कर तथा अपनी-अपनी उत्कृष्ट रचनाएं लिखकर अपनी वाणी पवित्र और लेखनी धन्य की है। इन सबकी तेजस्विता का रहस्य गंगाजल था।
गंगाजी को ज्ञात है कि और लोग तो अपने पाप धोने के लिए ‘मेरे पास आते हैं, जबकि संत मुझे पावन करते हैं।’ कहते हैं, जब प्रयाग में भारद्वाज मुनि स्नान करने आते थे, तब गंगा भी अति उत्साह और प्रसन्नता से – पच्चीस सीढ़ियां ऊपर आ जाती थी महर्षि बाल्मीकि की श्रद्धांजलि रही है ‘हे माता भागीरथी। तुम्हारे तट पर निवास करते, तुम्हारे जल का पान करते, तुम्हारी लहरों में झूलते, तुम्हारा नाम लेते, तुम्हीं में दृष्टि लगाए हुए मेरा शरीरपात हो। ”ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या’ का उद्घोष करने वाले श्री आदि शंकराचार्य अत्यंत आश्चर्यचकित होकर प्रेरित हुए – हे गंगे, जो कलियुग के पाप यज्ञ, दान, तप और ज्ञान से नष्ट नहीं होते, वे तुम्हारे जल की धारा के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाते हैं। भागीरथ उद्यम से स्वर्ग से मृत्युलोक में पधारी देवनदी गंगा आध्यात्मिक रूप से जितनी पवित्र, निर्मल, स्वच्छ और पतित पावनी हैं, ऋषि-मुनियों ने भौतिक रूप से भी गंगा को उतना ही पवित्र, निर्मल और स्वच्छ रखने का कर्तव्य-निर्देश दिया है। 
आज गंगा में प्रदूषण के प्रादुर्भाव का मूल कारण मनुष्य की भोगवादी प्रवृत्ति है। तुच्छ स्वार्थ हेतु, धन कमाने की होड़ में, मानव गंगा की नैसर्गिक धारा में औद्योगिक संस्थानों का दूषित द्रव्य और नगरों के मल मूत्र से दूषित नाले गिरा रहे हैं। हम इसी तरह गंगा का उदर अवशिष्ट से भरते रहे, तो परिणाम कल्पनातीत होगा।