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यूरोप की चाशनी में पगे हमेशा सुधार के नाम का डंडा पीटते रहते हैं परंतु सुधार अपने- आप में कोई बढ़िया चीज़ नहीं है और न ही ‘तातस्य कूपम्’ कहकर खारा पानी पीना ही कोई बहादुरी है जैसा कि कट्टरपंथी किया करते हैं। कभी-कभी सुधार रसातल ले जाने का सबसे अच्छा रास्ता होता है, लेकिन उसी तरह निश्चलता भी सड़ांध पैदा करने का सबसे अच्छा उपाय है। बीच का रास्ता भी हमेशा सबसे अच्छा नहीं होता, बहुत बार वह आदमीकी भीरुता और आवश्यकता को छिपानेवाला पर्दा होता है। लोग अपने-आपको उग्रपंथी, मध्य मार्ग या कट्टरपंथी कहते और मानते हैं और किसी-न-किसी सूत्र के अनुसार चलते हैं। हम पद्धतियाँ और दलों तथा वादों की भाषा में सोचते हैं और यह भूल जाते हैं कि असली मानववाद नहीं, सत्य है पद्धतियाँ ज्ञान को क्रमबद्ध रखने में सहायक होती हैं और दल सम्मिलित कार्य के लिये अच्छा साधन । लेकिन साधारण: हम उनका सहारा लेकर सोचने के कष्ट से पिंड छुड़ा लेते हैं। हमें कट्टरपंथियों की स्थिति देखकर आश्चर्य होता है। वे हर चली आयी चीज को भागवत बनाने की कोशिश करते हैं।

हिन्दू समाज के कुछ रीति-रिवाज केवल प्रथा के अनुसार चले आ रहे हैं। हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि वे भूतकाल में ऐसे ही थे और इस बात की कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती कि वे भविष्य में भी बने ही रहेंगे। बहुत-सी चीजों के बारे में हम यही कह सकते हैं कि वे पाँच सौ बरस से चली आ रही हैं लेकिन यह कोई कारण नहीं हैं कि उन्हें चिरस्थायी होना चाहिये। प्राचीनता या अर्वाचीनता सत्य की या उपयोगिता की कसौटी नहीं है। सभी ऋषि भूतकालमें ही समाप्त नहीं हो गये, अवतार और भी आया करेंगे, श्रुति अब भी आ रही हैं।

क्या धार्मिक ग्रंथो से चिपके रहना सही है 

कुछ का कहना है कि हमें मनुस्मृति और पुराणों के साथ चिपके रहना चाहिये क्योंकि वे प्राचीन और पवित्र हैं क्योंकि उनका जन्म भारत में हुआ है। लेकिन मजा यह है कि वे इन ग्रंथोंको अ से ज्ञ तक मानने के लिये तैयार नहीं हैं, वे उनमेंसे चुनकर अपनी पसन्द की चीजें ही मानते हैं। यह तो सत्यके साथ खिलवाड़ करना हुआ। हम मनु के नाम की दुहाई तो देते हैं पर मानते उसीको हैं जो हमारी पसन्द के अनुसार हो । आज मनु को पूरी तरह लागू कर सकना ऐसा ही होगा जैसा गंगा को गंगोत्री की ओर बहा ले जाना । परिवर्तन की आवश्यकता को स्वीकार न करना मूढ़ता है। सभी संस्कृति और सभ्य लोग आचार का पालन करते हैं। यह प्रथा हमेशा से चली आयी है परंतु हमने सुदूर अतीत के आचारों को भुला दिया है, उनमें से कुछ तो ऐसे भी होंगे जो आज अनाचार कहलायेंगे, उनकी खिल्ली उड़ायी जायेगी यो उन्हें बुरा-भला कहा जायगा, इसी भांति हो सकता है कि आज हम जिन बातों को दबा देते हैं वही आगामी कल के आचार हों । आचार से आदमी शिष्ट बनता है, शिष्ट लोग आचार नहीं गढ़ते।

हमारे रीती-रिवाज है संस्कृति का आधार 

समाज के विद्रोही ही नये आचार का रूप देते हैं, स्वयं श्रीकृष्ण के बारे में यह कहा जाता था कि वे अनाचार फैलाते हैं। प्राचीन रीति रिवाजोंका एक मूल्य अवश्य था, उन्होंने समाज की नींव को मजबूत रखने में सहायता दी, परंतु हर एक का अपना काल होता है। अपनी अवधि होती है । उनसे चिपके रहना सम्भव नहीं है। रीति-रिवाज और विधि-विधान बदले जा सकते हैं, हर युगका अपना शास्त्र होता है लेकिन यह हुकुम नहीं दे सकते कि अमुक चीजको एकदम बदलना होगा या उसे हमारा बतलाया हुआ अमुक रूप देना होगा। दुर्भाग्यवश हमारे समाज सुधारक यूरोप की धारणाओंको अधकचरे रूपमें लागू कर देना चाहते हैं । वे अपने यूरोपको नहीं जानते और जानते भी हैं तो अच्छी तरह से नहीं और बस वे यह मान बैठते हैं कि जो भी चीज यूरोपीय धारणाओंसे मेल नहीं खाती वह अवांछनीय और त्याज्य है। वे यही मानते हैं कि यूरोप जिसको सराहता है वह बुद्धिसंगत और अच्छी होगी । वे यूरोपीय लोगों की अपेक्षा यूरोप के बल-विक्रम, ज्ञान, आमोद-प्रमोद आदिपर ज्यादा लट्टू है। वे अन्धे-से-अन्धे आत्म-तुष्ट यूरोपियनकी अपेक्षा यूरोप की दुर्बलता, अज्ञान और दुःख-दैन्यके प्रति अधिक अन्धे हैं। पाश्चात्य लोग हमारे आगे अपना जो सुहावना रूप रखते हैं वे उसीपर मोहित हो जाते हैं, वे पीछे छिपे हुए रोग-शोक और गन्दगीको देखनेमें असमर्थ रहते हैं । 
यूरोपीय जातियाँ अपने शरीर और अपने समाज दोनोंको छिपाकर रखना पसंद करती हैं । वे अशुभसे नहीं अशुभके दिखायी देनेसे डरते हैं। अगर कहीं उनकी आँखें अपने कुछ दागोंपर पड़ जायें तो वे अपने अपने और औरोंसे कहते हैं, यह कुछ नहीं है, हम स्वस्थ हैं। हम पूर्ण हैं, हम अजर-अमर हैं। समाज-सुधारक अमुक तर्को को‌‌ रटता जाता है, वह अपने विचारों से प्रेम तो करता है पर उनके अनुसार जीवन यापन नहीं करता। यूरोपके बताये हुए इलाज उसके लिये रामबाणका काम देते हैं जिनपर संदेह नहीं किया जा सकता। उदाहरणके लिये उसने मान लिया है कि बाल-विवाह शारीरिक स्वास्थ्य के लिये हानिकर है । उसे अच्छा नहीं लगता अगर कोई याद दिलाये कि जातिकी शारीरिक दुर्बलता तो आधुनिक काल की देन है । बाल- विवाह करनेवाले हमारे पुरखे बलवान्, तेजस्वी और सुन्दर होते थे । वह नर्तकियों का अंत लाने में तो प्रयत्नशील हैं पर इस बातकी परवाह नहीं करता कि‌‌ वेश्याओंकी संख्या बढ़ती जाती है । शायद कुछ लोग यह भी सोचते हो कि यह एक सौभाग्य है कि भारतीय रोगों की जगह यूरोपीय रोग ले रहा है ! वह समाजके सहयोगकी प्रथाके पीछे लट्ठ है। लेकर पड़ा है परंतु यह नहीं देखता कि यूरोप साम्यवाद की ओर दौड़ रहा है।

कट्टर पंथी सोच भी गलत 

सुधारक हो या कट्टरपंथी दोनों ही अपने-आपको ब्यौरे की चीजों में खो देते हैं लेकिन ब्यौरे को रूप देते हैं सिद्धांत। समाज सुधारक जो प्रश्न उठाते हैं उनका हल समाज की स्थायी भलाईपर असर डाले बिना पाया जा सकता है। एक उदाहरण है अंतर्जातीय विवाह । आधुनिक प्रश्न तो यह है कि क्या जातिवादके शरीर और आत्माका रहना जरूरी है । हिंदुओं को याद रखना चाहिये कि जातियाँ केवल व्यवसाय संघ हैं जो आजकल कामके नहीं रहे। ये शाश्वत धर्म, चतुर्वर्ण नहीं हैं। इसका बहुत महत्त्व नहीं है कि विधवा शादी करें या अकेली ही रहें। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्त्री, पुरुषका सामाजिक और वैधानिक रूपमें कैसा संबंध होगा, वे उससे निचले, उसके बराबर या उससे उच्चतर स्तर पर रहेंगी-यह संभव नहीं है, सुदूर अतीतमें वे उच्चतर स्तरपर रह चुकी हैं।
कुछ कुछ मानक सार्वजनीन हैं और विशेष समाजों के लिये । आज संसारके सभी समाजों को सुधार की जरूरत है। हमारे जीवन में एक मानक हमारा अपना होने के साथ-साथ सार्वजनीन भी है और वह है शाश्वत धर्म । तुम जहाँ हो उसी जगह से जोंक की तरह चिपके रहना धर्म नहीं हैं और उसी भांति बिना देखे-भाले उछल-कूद करना भी धर्म नहीं है। अपने आंतरिक और अपने बाह्य जीवन में, अपने समाज और अपने व्यक्तित्व में भगवान को पाना, उनका साक्षात् करना हमारा शाश्वत धर्म है – एष: धर्म सनातन: । भगवान कोई प्राचीन कालका अवशेष नहीं हैं, वे कोई नया अजूबा भी नहीं हैं, न वे मानव धर्मशास्त्र हैं न विद्यारण्य, न रघुनंदन । वे यूरोपीय भी नहीं हैं । भगवान तत्त्वत: सच्चिदानन्द हैं और अभिव्यक्तमें वे सत्य, प्रेम और शक्ति हैं। जो कुछ सत्य के अनुरूप हो, जो कुछ मनुष्यों में प्रेम बढ़ाता हो, जो कुछ हिन्दू धर्म है। भगवान त्रिमुखी सामंजस्य हैं, वे एकांगी नहीं हैं। हमारा प्रेम हमें बुद्धिहीन, अंधा या दुर्बल न बना दे, हमारा बल हमें कठोर और भयंकर न बनाये, हमारे नियम या विधान हमें कट्टरपंथी या भावुकताके मारे छुई-मुई न बना दें। हमें शान्तिके साथ, धीरजके साथ निष्पक्ष होकर सोचना चाहिये। हमें पूर्ण रूपसे तीव्रताके साथ प्रेम करना चाहिये, परंतु बुद्धिमत्ता के साथ हम बल, सामर्थ्य और उदात्तताके साथ काम करें। फिर भी हम भूलें कर सकते हैं परन्तु भगवान कभी भूल नहीं करते । हम फैसला करते और उसके अनुसार क्रिया करते हैं । भगवान फलका निश्चय करते हैं और वे जो कुछ निश्चय करते हैं वह अच्छा ही होता है। वे अब भी निश्चय कर रहे हैं।
मनुष्य अपने-आपको समाज सुधार और निर्दोष कट्टरपंथके बारेमें यातनाएँ दे रहे हैं और समाज सुधारके सफल हुए बिना पुराण पंथ जर्जर होता जाता है । लेकिन हमारे गाल बजानेके बावजूद भगवान भारत का चक्कर लगा रहे हैं और अपना काम सिद्ध कर रहे हैं। मनुष्य के जाने बिना ही सामाजिक क्रांति की तैयारी हो रही है और वह उस दिशामें नहीं जा रही जिसमें वे सोचते हैं क्योंकि वह केवल भारतको ही नहीं सारे जगत्को अपनी बाहोंमें ले रही है। हमें अच्छा लगे या न लगे भगवान भारतके अतीत और यूरोपके वर्तमानके कूड़ेको बुहार डालेंगे लेकिन सभी काम झाडूसे नहीं हो जाता। कभी-कभी उन्हें तलवारका उपयोग करना होता है । संसार आसानीसे बदलनेके लिये तैयार नहीं होता और तब उग्र साधन जरूरी हो जाते हैं।
ये तो सामान्य सिद्धान्तकी बातें हुईं लेकिन हम जाति-विशेष और युग विशेष नियमों का कैसे पता लगायें ? हम जिस युग में रहते हैं उसके लिये उचित प्रकारकी क्रियाएँ और संस्थाएँ जरूरी है। जिस शक्ति या इच्छा शक्ति का उपयोग किया जाता है उसकी क्रिया देश, काल और पात्र या माध्यमपर निर्भर है । जो प्रथा एक युग के लिये ठीक होती हैं वही दूसरे युग के लिये बिलकुल गलत हो सकती हैं। भगवान एक समाज-पद्धतिके स्थानपर दूसरी समाज-पद्धति, एक धर्म के स्थान पर दूसरा धर्म, एक संस्कृति के नाम पर दूसरी संस्कृति को लाकर मनुष्य को मानव पूर्णताके मार्गपर ले जा रहे हैं।
जब भगवान अपनी वैश्व चक्राकार गतियोंमें सारे जगत्पर स्थायी सामंजस्य स्थापित कर देते हैं तो वह मनुष्य के लिये सत्य युग होता है। जब सामंजस्य लड़खड़ाता है, जब उसे बनाये रहना कठिन हो जाता है, उसे मनुष्य के स्वभावसे नहीं, किसी स्वीकृत शक्ति अथवा राजनीतिक उपायोंद्वारा स्थापित किया जाता है तो वह मनुष्य के लिये त्रेता होता है। जब लड़खड़ानेका स्थान ठोकरें खाना ले लेता है और हर कदम पर बड़े कष्टसाध्य प्रयास, नियम और सावधानीके साथ उसे बनाये रखना पड़ता है तो वह द्वापर होता है। जब विघटन और सब कुछ तहस-नहस हो जाता है, कोई भी चीज आनेवाले प्रलयको नहीं रोक सकती तो वह होता है कलयुग। यह सभी मानव विचारों, प्रथाओं, संस्थाओं की प्रगतिका स्वाभाविक विधान है। हम रूप और आकारसे चिपके रहते हैं इसलिये दुखी होकर सोचते हैं कि यह मानव अवनतिका विधान है, मानव उपलब्धियों का खोखलापन है। लेकिन यह सत्य नहीं है ।

अपनी सोच को विकसित करें 

यह बात समूहपर लागू होती है और उससे कुछ कम अंशमें ब्यौरेकी चीजोंपर भी ठीक उतरती है। हम कह सकते हैं कि हर मानव‌‌ धर्म, समाज, सभ्यता के चार युग होते है। यह गति बहुत स्वाभाविक और हितकर है । यह न तो निराशावादको प्रश्रय देना है न मूक नियतिवाद और विनाशको पोसना । अगर हर सत्य युग के बाद कलि आता है तो यह भी उतना ही सच है कि हर कलि अगले सत्यकी तैयारी करता है । नये सृजनके लिये पहलेका विनाश जरूरी है और नया सामंजस्य, जब वह पूरी तरह स्थापित हो जायगा, पहलेके सामंजस्यसे ज्यादा पूर्ण होगा। शनैः शनैः आनेवाली सृष्टि और अर्द्धपूर्णताके कालमें अर्द्ध सफलता, असफलतामें बदलती जाती है, निरुत्साह, शक्तिहीनता, श्रद्धाकी क्षीणता आदि बीचमें आकर बादलकी तरह छा जाती है। इन्हें देखकर लोग विलाप करना शुरू कर देते हैं कि सब कुछ मिट रहा है लेकिन अगर उन्हें भगवान के प्रेम और उनकी प्रज्ञापर विश्वास है और वे अपनी घिसी-पिटी संकरी धारणाओंकी जगह भगवान की इच्छाको ऊँचा स्थान देते हैं तो उन्हें आग्रहके साथ कहना और मानना चाहिये कि सब कुछ नया जन्म ले रहा है। बहुत कुछ निर्भर है काल और भगवान के प्रयोजनको ज्यादा महत्त्व देना चाहिये।  काल‌ पुरुष‌‌ के कक्ष के लिये उठ खड़ा हुआ है।
वह एक जगत्को नष्ट करनेपर तुला है और कौन है जो उसकी महाशक्ति और उसके आतंकके आगे खड़ा हो सके । लेकिन भगवान केवल नाश ही नहीं कर रहे, वे साथ-ही-साथ नूतन सृजन भी करते जा रहे हैं। इसलिये बुद्धिमानी इसीमें है कि हम मरते हुएके साथ लिपटकर रोने-चिल्लानेकी जगह जो नया जगत् जन्म ले रहा है उसके बारे में खोज करें और उसके आनेमें सहायता करें । लेकिन भगवान के अभिप्राय को समझना आसान नहीं है । हम इस कुरुक्षेत्रमें लड़ने वाले सैनिकों के लिये बने तम्बुओंको ही भविष्य का भजन मान लेते हैं और इन्हींको सराहते रह जाते हैं । पण्डितोंका यह कथन ठीक है कि सतयुग और कल के कार्य-कलाप और कर्त्तव्य जुदा-जुदा हैं परंतु वे अपने इस ज्ञान को ठीक तरह उपयोग नहीं कर पाते । वे या तो यह जानते ही नहीं या फिर भूल जाते हैं कि कलि विनाशके साथ नव जन्मका भी काल है। न बदलने वाले और बचाये न जा सकनेवाले प्राचीनके साथ घोर निराशामें चिपकनेका समय नहीं है। वे अतीत के पुजारी बस कलिवज्ज्य (कलियुग में वर्जित विधि-विधान जैसे अश्वमेघ, गोमेध आदि यज्ञ) को ही लेकर बैठे रहते हैं, उन्हें इस बातका ख्याल नहीं रहता कि अतीतके सामंजस्यकी दुर्बलताओंका ही नहीं, बल्कि उसके बलका भी वर्जन किया गया है, जिन चीजोंको बचाकर रखा जाता है वह भीपरिवर्तनके सागर तटपर खड़े अस्थायी सख्ते हैं, नये भवनके बननेतक ही इनकाउपयोग है, इन्हें भी एक दिन उमड़ती हुई क्रुद्ध लहरें अपनी लपेटमें ले लेंगी और सागर इन्हें भी लील जायेगा । 
क्या विनाश का समय आ गया ? हमारा ख्याल है कि वह आ चुका है। उस चढ़ते हुए सैलाबके घोर शब्द को सुनो जो आक्रमण भी ज्यादा भयंकर है। उस निरानन्द, निष्ठुर, परंतु धीमे उत्खनन की ओर कान दो । देखो एक पर एक टेढ़ी-मेढ़ी, झकोले खाती हुई गाड़ी धीरे-धीरे या धड़ा के साथ एकाएक टूटती और इन उत्ताल तरंगोंका ग्रास बनती जा रही है। क्या नयी रचनाका समय आ गया? हमारा उत्तर हैं हाँ, अवश्य । मानव जातिकी क्रियाशीलताको देखा, उसकी दौड़- भाग पर नजर डालो, वह कितनी तेजी से नये-नये क्षेत्रों में देखती, नयी चीजों का पता लगाना आगे बढ़ती जा रही है। आते हुए नये अवतारों और नयी विभूतियोंको देखो। ना कितनी तेजी से भारी कदम रखते हुए एक-दूसरेके पीछे चलते चले आ रहे हैं। क्या ये आनेवाले शुभके लक्षण नहीं है? क्या ये इस बात की घोषणा नहीं करते कि बड़े-से-बड़ा अवतार कलयुग में सतयुग के पहले चरणकी स्थापना करने के लिये आ रहा है। 
प्राचीन योगी और ऋषि-मुनि अपनी गुप्त शिक्षा में हमें बतला गये हैं कि कलिकालमें भी सत्य-त्रेता द्वापर और कलिके उपचक्र चलते हैं। सत्य में एक अस्थायी और अपूर्ण सामंजस्यकी स्थापना होती है, उपत्रेता और द्वापर उसे घिस डालते हैं उपकर समाप्त कर देता है। उसके बाद फिरसे वही चक्र शुरू होता है। आने वाला स्थायी पता और विलयन पिछले अस्थायी पतनकी अपेक्षा अधिक भयानक और घोर विनाशकारी होता है। । कलिसे पहले पाँच हजार वर्ष समाप्त हो चुके हैं जो प्राचीन सत्यके अवशेषों विनाशके लिये जरूरी थे दुर्बलता, हिंसा, उग्रता, भूल-भ्रांति, अज्ञान विस्मृति बढ़ते हुए वेगके साथ काम को पूरा करने में लगे हैं। पहले कला-सत्य की पौ फटने को है। धुंधली भले हो पर प्रभात की पहली किरणें दिखायी देने लगी हैं।

हमारा देश और हमारी संस्कृति सर्वोपरि 

हाँ, एक नये सामंजस्य का उदय हो रहा है परंतु उसकी नींव न यूरोपीय जड़वादकी पतली, कमजोर तीलियोंपर खड़ी है ना पश्चिम से पूर्व मिथ्यात्व और अर्द्ध सत्य पर । जब विनाश होता है तो रूप और आकार नष्ट होते हैं, उनके अन्दर स्थित आत्मा नहीं। यह जगत् और उसकी गतिविधियाँ उस एकमेव शाश्वतके परिधान हैं जो हमेशा नये-नये वस्त्र धारण करके परिवर्तनोंका मजा लेता है, जो सतयुग मर चुका है उसका सत्य आने वाले सतयुग सत्य से भिन्न नहीं है क्योंकि यह सत्य अपने-आपमें जरा-मरण से परे और हमेशा बना रहता है।
इस सत्य के लिये भारत चुना हुआ देश है, वह भारत की आत्मा में सुरक्षित है और उस आत्मा के जागनेकी प्रतीक्षामें है। भारत की आत्मा सिंह सदृश और प्रकाशमान है। वह प्रेम, शक्ति और प्रज्ञाके प्राचीन कमल दलोंमें बन्द है, अपने दुर्बल, गन्दे, ईश्वर, दीन-हीन बाह्य शरीर में नहीं। केवल भारत ही मानव जातिके भक्ष्यिका निर्माण कर सकता है। भारत में ही समर्थ अवतार, राष्ट्रोके आगे प्रकट होता है और जब तक वह प्रकट न हो भारत को अपने-आपको इस धूल और पंखे से निकालना होगा जो टूटे हुए सतयुग का अवशेष है। उसे योग द्वारा अपने मृत और भविष्य को जानना होगा। यहाँ हम इस ब्यौरेमें नहीं जा रहे हैं कि हमें क्या नष्ट करना है और क्या बनाना है लेकिन हम जो भी करें भगवान के प्रेम, शक्ति और प्रज्ञाके प्रकाशमय करें।