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एकता और सतर्कता :एम. वेंकैया नायडु

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विश्व के दूसरे भागों की तरह भारत में हमने भी देशव्यापी पूर्ण बंदी, सोशल डिस्टेंसिग, निजी स्वच्छता जैसे उपायों से कोरोना वायरस के भयावह प्रसार को रोकने की कोशिश की है। सामुदायिक व्यवहार में इस संयम के अभीष्ट परिणाम भी मिले हैं। जहां-जहां इन उपायों का कड़ाई से पालन किया गया है, वहां पर रोगियों की संख्या तथा मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई है। इसके विपरीत जहां इन उपायों का उल्लंघन या उनके पालन में ढिलाई बरती गई, वहां पर रोगियों की संख्या में तेजी देखी गई है।

निजामुद्दीन में हुए समागम ने देश का ध्यान इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य की ओर खींचा है। हालांकि हमको यह समझना चाहिए कि यदि हम चेतावनी के प्रति लापरवाह हो जाते हैं, तो उसके परिणाम क्या हो सकते हैं। यह घटना उसकी एक बानगी मात्र थी। हमें इस घटना के और कोई भी निहितार्थ नहीं निकालने चाहिए और न ही किसी समुदाय को अनावश्यक रूप से पूर्वाग्रहों के चश्मे से देखना चाहिए या चिह्नित करना चाहिए। कुछ लोगों और संगठन की गलती की वजह से पूरे समुदाय को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन उन पर्वों, त्योहारों तथा सांस्कृतिक, सामुदायिक अवसरों के कारण ही समृद्ध और जीवंत है, जिन्हें हम साथ मिल-जुलकर मनाते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग हमारे सामुदायिक जीवन के साझा हर्ष और आत्मीय उल्लास की भावना के विपरीत है।
लेकिन हमें मजबूरन यह मार्ग अपनाना पड़ा है, क्योंकि इसके अलावा इस घातक वायरस के संक्रमण को सीमित करने का और कोई विकल्प है ही नहीं। इस घातक महामारी से बचने के लिए हमें अपने धार्मिक, सामुदायिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में छोटे-मोटे व्यवधानों को बर्दाश्त करना होगा। यह कष्टप्रद हो सकता है, पर इसके अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है।

सभी को इस महामारी की प्रकृति और उसके निदान के लिए आवश्यक सावधानियों को अच्छी तरह समझना जरूरी है। नागरिकों को न तो इससे डरना चाहिए, न ही लापरवाह होना चाहिए। जो इससे गंभीर रूप से प्रभावित हैं, उन्हें चिकित्सकीय उपचार मिलना चाहिए। न तो उनसे संदेहपूर्ण भेदभाव किया जाना चाहिए और न ही कोई दोष या आक्षेप लगाया जाना चाहिए। हाल के दिनों में संदेह करने और दोषारोपण का एक और दुर्भाग्यपूर्ण आयाम सामने आया है।

उन स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले हो रहे हैं, जो खुद के संक्रमित होने की परवाह किए बगैर गंभीर खतरा मोल ले रहे हैं। बहुत से ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जहां डॉक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्य कर्मियों तथा अन्य समाजसेवियों को आश्रय  और आवासीय सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है, उन्हें संदेह से देखा जा रहा है, जैसे कि वे वायरस फैला देंगे। भारत जैसे देश में यह दुर्भाग्यपूर्ण है, जहां चिकित्सकों को आदर की दृष्टि से देखा जाता रहा है।

भारत सरकार द्वारा महामारी रोग अधिनियम, 1897 में किया गया संशोधन सर्वथा समीचीन कदम है, जिसमें स्वास्थ्य कर्मियों पर हमलों को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध बना दिया गया है। मुझे हर्ष है कि अधिकांश लोग प्रायः दिशा निर्देशों का पालन कर रहे हैं। सभी धर्मगुरु नई स्थिति के अनुसार, परंपराओं को छोड़कर, धार्मिक पूजा अनुष्ठानों को सीमित करने के प्रावधान कर रहे हैं।

भेदभाव और रूढ़ियां बाधाएं हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। अपने सामुदायिक व्यवहार को बदलने के लिए हमें भी समयानुकुल अधिक लचीला दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, तभी हम कोरोना के विरुद्ध अपने अभियान को प्रभावी रूप से जारी रख सकते हैं। लगभग सभी धार्मिक संस्थान बंद हैं, किसी धार्मिक समागम की अनुमति नहीं दी जा रही।

विश्व के अधिकांश प्रभावित देशों में यह व्यवस्था लागू है। यह संघर्ष मानव प्रजाति और प्राण घातक विषाणु के बीच है। इसे हम तभी जीत सकते हैं, जब हम बुद्धिमत्ता और तत्परता से इसका सामना करें। इस महामारी से कोई भी समुदाय या समूह निरापद नहीं है। हम रामनवमी, बैसाखी, ईस्टर तथा रमजान के अवसर पर क्रमशः हल्के और छोटे आयोजनों की आदत डाल रहे हैं।

इस वर्ष धार्मिक आस्था और ईश्वर में श्रद्धा का ही भाव हमारे हृदय में, हमारे घरों में बना रहे। रमजान के पवित्र माह के प्रारंभ के साथ ही मैं आशा करता हूं कि हम अपने घरों में ही रहें, अपने स्वजनों के साथ इबादत करें और यह उम्मीद करें कि इस चुनौती से शीघ्र ही उबर सकेंगे।

इस महामारी ने न केवल हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक, धार्मिक प्रथाओं में व्यवधान उत्पन्न किया है, बल्कि हमारी शैक्षणिक और आर्थिक गतिविधियों को भी बाधित किया है। इसने हमारे देश की जनसंख्या के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है। हम सब एक साथ मिलकर इन बढ़ती हुई चुनौतियों का समाधान खोजने में लगे हैं। भारत सरकार, राज्य सरकारें तथा स्थानीय निकाय-सभी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और कठिनाइयों को कमतर करने के लिए हरसंभव सुविचारित कदम उठा रहे हैं। यद्यपि, अब भी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

हमें निरंतर सतर्क रहना होगा, ढिलाई की गुंजाइश नहीं है। हमें आंकड़ों की वस्तुनिष्ठ, निस्पृह रूप से समीक्षा करनी होगी और उसी के अनुसार प्राथमिकता के आधार पर आगे की रणनीति तय करनी होगी। हमें संक्रमण को रोकने के सभी उपायों को आवश्यकतानुसार सख्त करना होगा। समाज के जरूरतमंद गरीब वर्ग के लिए मानवीय कल्याणकारी उपायों को और बढ़ाना होगा।

यह समय है, जब हम अपने संकल्प और प्रयासों में एकता दिखाएं। वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए परस्पर दूरी बनाएं रखें, लेकिन मनुष्य के रूप में अपनी मानवीयता से सबको स्पर्श करें। हम अपने धर्म-संप्रदाय के मूल संस्कारों, उपदेशों को फिर से समझें। हम अपना ख्याल रखें और संभव हो, तो अपने पास रहने वालों का भी ध्यान रखें।

मुझे आशा है कि इस चुनौती के विषय में हमारी समझ, हमारे आकलन में प्रायः सहमति और सम्मति है। और इस चुनौती से उबरने के लिए सावधानी और समझदारी से कार्य करने का हमारा संकल्प भी साझा है। इस संक्रमण के विरुद्ध देशव्यापी अभियान को किसी भी स्तर पर राजनीतिक दलों के बीच किसी भी मत-मतांतर से प्रभावित न होने दें। हर स्तर पर एकता और सतर्कता ही हमें इस बहुआयामी आपदा से सफलतापूर्वक उबार सकती है।

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