$type=ticker$count=9$cols=4$cate=0$font=14px

पैसा खुशहाली की जड़ नहीं है, प्रसन्न रहना ही है सबसे बड़ी दवा

SHARE:

Happy peoples
आज का युग भौतिकवादी है। इसलिये पैसे की अहमियत ज्यादा है, पर एक बात पक्की है कि पैसे से वह खुशी नहीं खरीदी जा सकती, जिसे सही मायनों में खुशी कहा जाता है। और सिर्फ नाम या दाम कमाकर भी आप अपने को खुश नहीं रख सकते। शोधों से एक और बात यह भी साफ हुई है कि खुश रहने का सामाजिक स्तर, इन्कम, लिंग या फिर शारीरिक रंग से कोई ताल्लुक नहीं है। शिकागो के दि नेशनल ओपीनियन रिसर्च सेंटर ने 1957 में स्वस्थ लोगों पर एक सर्वेक्षण किया था। 
उस समय 35 फीसदी लोगों ने अपने आपको बेहद खुशहाल बताया था, मगर अब खुशहालों का वह औसत 35 फीसदी से घटकर 30 फीसदी से भी कम हो गया है। आज की तारीख में अमेरिका सबसे संपन्न देश है, मगर पिछले साल जब पूरी दुनिया का सर्वेक्षण किया गया, तो पता चला कि दुनिया में सबसे अधिक खुश रहने वाले बांग्लादेशी हैं। सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि किसी व्यक्ति की जब रोटी, कपड़ा और मकान जैसी प्राथमिक आवश्यकतायें पूरी हो जाती हैं, तो फिर उसकी खुशी में उस औसत से वृद्धि नहीं होती, जिस औसत से उसकी आमदनी बढ़ती है।
सवाल यह उठता है कि जब पैसा खुशहाली की जड़ नहीं है, तो फिर कौन-सी चीज है? न्यूयॉर्क सिटी के फॉर्धम युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि व्यक्तित्व ही खुशहाली की जड़ है। मसलन नौकरी चले जाने या किसी प्रिय की मौत हो जाने पर होनेवाले दुःख को अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग ढंग से सहता है और अलग-अलग रूपों में लेता है। मतलब यह कि दुःखों को सहन करना आपकी व्यक्तिगत क्षमता एवं व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है।

हालात का डटकर मुकाबला करें...

हालांकि हमारे अन्दर प्रसन्नता या खुशी के जीन' नहीं होते, पर हमारे अन्य जीन्स हमारी सन्तुष्टि का स्तर बढ़ाने में जरूर कुछ भूमिका अदा करते हैं। उनसे आप किस हद तक खुशी हासिल करते हैं, यह खुद आप पर ही निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी खतरनाक काम को करने में आपकी मां डरती हैं, तो आपको वैसा ही डर लगेगा। मगर यदि आप चाहें तो चुपचाप बैठने के बजाय कठिन और डरावनी परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करके खुद को मजबूत बना सकते हैं। ऐसा करने से आपके अन्दर का डर धीरे-धीरे निकलता चला जायेगा।‌‌ मिनियापोलिस की 'युनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा' के मनोवैज्ञानिकों ने हजारों जुड़वा लोगों तथा जीनगत खुशहाली पर खोज की थी। खोज में उन्होंने पाया कि हर व्यक्ति के अन्दर 'हीन चालक' ('Genetic Steering') अलग-अलग होते हैं, जो स्वाभाविक रूप से उसे हालात के मुताबिक ढालते हैं। फिर भी हम खुश नहीं रहते। इसकी वजह है अपने स्वभाव में बदलाव न लाना। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि खुश रहने के लिये ज्यादा प्रयासरत रहने की वजह से भी निराशा हाथ लगती है, क्योंकि किसी चीज की आशा करने पर जब वह चीज नहीं मिल पाती, तो निराश होना स्वाभाविक है।

अपने को स्वस्थ महसूस करें...

अध्ययनों में लोगों से जब यह पूछा गया कि उनके जीवन में अहम क्या है, तो ज्यादातर लोगों ने 'अच्छे स्वास्थ्य को ही अहम बताया। मगर सवाल यह है कि जो स्वस्थ रहते हैं, क्या वे वाकई हमेशा खुश रहते हैं? पिछले दो दशकों से इस बारे में किये जा रहे अध्ययनों में अध्ययनकर्ताओं ने कुछ स्वस्थ लोगों से यह पूछा कि वे अपने जीवन से संतुष्टि कैसे पाते हैं? फिर उन्होंने लोगों के जवाबों की डॉक्टरों द्वारा इस बारे में किये गये मूल्यांकन से तुलना की। तुलना में उन्होंने देखा कि डॉक्टरों ने जिन लोगों को स्वस्थ बताया था, उनमें से कुछ खुश और सन्तुष्ट रहते थे, तो कुछ नहीं। 
आखिरकार अध्ययनकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि जीवन के प्रति संतुष्टि का व्यक्ति के स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान से गहरा ताल्लुक है। 1991 में नीदरलैंड की एमस्टर्डम यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक अध्ययन से पता चला कि जो लोग बीमार होते हुए भी अपने जीवन से संतुष्ट रहते हैं, वे उन लोगों से थोड़ा ही कम खुश रहते हैं, जिन्हें स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई दिक्कत नहीं होती। पर, जो लोग हमेशा निगेटिव विचारों का चिन्तन एवं अनुभव करते रहते हैं, उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है।
दूसरे शब्दों में यूं समझिये कि आप अपने जीवन को यदि बेकार समझते हैं, तो आप ऐसे पेट दर्द को बुलावा दे रहे हैं, जो आपको कभी नहीं हुआ। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक भय, असुरक्षा की भावना, मानसिक तनाव आदि निगेटिव विचारों से मस्तिष्क में स्थित भावना नियंत्रण केन्द्र (Limbic centre) पर दुष्प्रभाव पड़ता है। नतीजतन एड्रेनलिन और नारएड्रेनलिन जैसे तनाव हार्मोन का रिसाव बढ़ जाता है, जिससे मांसपेशियों में दर्द, सिर दर्द, कमर दर्द, पाचन सम्बन्धी गड़बड़ियां, रक्तचाप बढ़ना आदि समस्यायें पैदा होती हैं। जबकि खुशनुमा मूड होने पर शरीर में एंडोर्फिन नामक हार्मोन का स्त्राव होता है, जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है।वैसे चिड़चिड़े स्वभाव को बदलने का एक तरीका कसरत भी है। मगर कसरत का प्रोग्राम शुरू करते समय इस बात को भी याद रखें कि जितना जरूरी कसरत करना है, उतना ही जरूरी आराम करना भी है। ध्यान, प्रार्थना, योगासन, टहलना आदि भी दिमागी स्वास्थ्य के लिये उतना ही फायदेमंद है, जितना कसरत करना।

उम्मीदों को और बढ़ायें...

विशेषज्ञों के मुताबिक उम्मीदों को बढ़ाने के लिये जीवन के पॉजिटिव और उज्ज्वल पहलुओं पर गौर करना चाहिये। यदि  आपको जब स्थायी रूप से ऐसा लगने लगता है कि आप जो कुछ कर रहे हैं, वह गलत ही हो रहा है और हर चीज में आपको अपनी ही गलती महसूस होने लगती है, तो आप चिन्तित हो जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में आपको अपने विचारों में बदलाव लाना चाहिये और ऐसा सोचना चाहिये कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, इसलिये विपरीत परिस्थितियां भी स्थायी रूप से नहीं रहेंगी।
100 साल की उम्र के कुछ बुजुर्गों से जब सर्वेक्षणकर्ताओं ने यह पूछा कि अपनी पूरी जिन्दगी में उन्होंने क्या सबक सीखा है, तो उन लोगों ने यही जवाब दिया कि चिन्ता करने से कुछ भी फायदा नहीं होता। उनके मुताबिक पॉजिटिव उम्मीदें रखना ही एकमात्र ऐसा रास्ता था, जिससे उन्हें कदम-कदम पर मदद मिली तथा अपने प्रियजनों की मौत से लेकर व्यक्तिगत नुकसान तक से उबर पाए ऐसा नहीं है कि इन घटनाओं से वे दुखी न हुए हों, पर पॉजिटिव विचारों के कारण ही उन्हें असहनीय दुख नहीं उठाना पड़ा और न ही वे चिन्ता के सागर में डूबे।

आस्थावान बनें...

अध्ययनों में देखा गया है कि जो लोग धार्मिक विचारों के होते हैं तथा अपने-अपने धर्म के मुताबिक मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि में जाकर प्रार्थना करते हैं या फिर किसी धार्मिक संस्था से जुड़े होते हैं, वे लोग ज्यादा खुश रहते हैं, बनिस्बत उन लोगों के जो धार्मिक स्वभाव के नहीं होते। अमेरिका में हाल ही में 32,000 लोगों पर एक और अध्ययन किया गया था। उस अध्ययन में धार्मिक संस्थाओं से जुड़े 45 फीसदी ऐसे लोग, जो सप्ताह में कई बार धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते थे, ने अपने जीवन को बेहद खुशहाल' बताया। जबकि महीने में एक बार से भी कम धार्मिक सभाओं में जाने वाले लोगों का औसत 25 फीसदी ही रहा, जिन्होंने अपने जीवन को 'बेहद खुशहाल' बताया। अध्ययनकर्ता कहते हैं कि प्रार्थना करने वालों से लोगों में उम्मीदों का संचार होता है। साथ ही धार्मिक बातें करने, धार्मिक गीत गाने, नृत्य आदि करने से मानसिक तनाव कम होता है और खुशी महसूस होती है।

तन्हाई से बचें...

तन्हाई या एकांत में अक्सर लोग दुःखी हो जाते हैं। हाल ही में किये गये एक सर्वेक्षण से यह बात साफ भी हुई थी कि कुंवारों की अपेक्षा विवाहित ज्यादा खुशहाल होते हैं। वही कुंवारे जब विवाहित हो जाते हैं, तो वे भी खुशहाल रहने लगते हैं। एक राज की बात यह भी है कि जीवन साथी से गहरा लगाव तलाक की संभावनाओं को कम करता है। लगभग एक दशक पूर्व सौ विवाहित जोड़ों पर किये गये अध्ययन से यह पता चला था कि महिला और पुरुष दोनों में ही सेक्स, रोमांस आदि का पुख्ता होना उनके गहरे सम्बन्धों पर निर्भर करता है। भीमनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर वैवाहिक जीवन में कोई दरार आती है, तो उसे भरने के लिये कोशिश करना अच्छा होता है। वैसे सुखी वैवाहिक जीवन वही होता है, जिसमें दोनों एक-दूसरे के प्रति लगाव रखते हैं और लगाव के ही कारण उन्हें रोमांस का आनंद मिलता है। हालांकि अध्ययनों में कुछ ऐसे भी बेहद खुशहाल जीवन जीने वाले पाये गये, जो शादीशुदा नहीं थे मगर उन्होंने भी तन्हा न रहकर अपने सच्चे दोस्त-यारों का एक सर्कल बना रखा था। वे बेहद सामाजिक थे। 
सहमत होना सीखें... 
खुशहाल जीवन जीना हो, तो व्यक्ति को लम्बी बहसों से परहेज करना चाहिये। बहस न करने से मतभेद नहीं उपजते, लिहाजा सम्बन्ध और अधिक प्रगाढ़ होता है। पर इसका मतलब यह भी नहीं कि आप इतने अधिक सहनशील बन जायें कि लोग आपके अस्तित्व को ही हल्का समझने लगें। हां, लोगों के विचार सुनकर, समझकर यदि वाजिब हों, तो जरूर उन पर अपनी प्रतिक्रिया दर्शानी चाहिये।
अगर आप खुद को सहनशील समझते हैं, तो आपको कठिन परिस्थितियों में अपनी सहनशीलता तथा विश्वास का परीक्षण भी करना चाहिये। 1992 में विश्वास और स्वास्थ्य के बीच सम्बन्धों को लेकर एक अध्ययन किया गया था, जिसके मुताबिक आप लोगों के प्रति अपनी अप्रोच' में परिवर्तन लाकर अपने विश्वास को बढ़ा सकते हैं। इसके लिये लोगों में आपको अच्छे विचार खड़े करने चाहिये। बुरे वक्त में यदि आपका कोई मददगार रहा है, तो अपने परिचितों, पास -पड़ोस के लोगों व नाते-रिश्तेदारों के सामने उसकी तारीफ जरूर करनी चाहिये। इससे लोगों में एक पॉजिटिव विचारधारा का विकास होगा।

अपने आपको अग्रणी बनाकर रखें...

अग्रणी या अगुवा होने का अहसास खुशी उत्पन्न करता है। एक खास अध्ययन में यहां तक पाया गया कि जो लोग अपने घर के पौधों को खुद पानी देते हैं, वे उन लोगों की अपेक्षा ज्यादा खुशी महसूस करते हैं, जिनके घर के पौधों में कोई और पानी डालता है। ऐसे ही एक दूसरे अध्ययन से पता चला कि जो लोग 'सुनिये सबकी, पर कीजिये अपने मन की' वाली तर्ज पर चलते हैं, वे ज्यादा खुश व सन्तुष्ट रहते हैं।

मन लगाना सीखें...

किसी भी काम में खो जाने को 'भाव-प्रवाह' कहते हैं। 'भाव प्रवाह' की स्थिति किसी भी कार्य में आ सकती है, चाहे वह बागवानी हो, रंगाई हो या फिर कोई उत्सव हो। खोने से संतुष्टि मिलती है। पर ऐसा तभी होता है जब आपकी बुद्धि और मौजूदा चुनौतियों में तालमेल हो। किसी भी कार्य में व्यक्ति डूबता भी तभी है, जब उसका उद्देश्य साफ हो और क्षण-प्रतिक्षण उसे पता हो कि उसे क्या करना है? जैसे आप जब टेनिस खेलते हैं, तो आपको इस बात का पता होता है कि किस तरह खेलने से आपको सफलता मिलेगी। ठीक उसी तरह उद्देश्य की प्राप्ति के लिये आवश्यक कदम उठाने के बारे में भी आपको जानकारी होनी चाहिये; तभी बुद्धि और क्रिया में तालमेल बैठता है।
जहां तक 'भाव प्रवाह' की बात है, तो यह अपने आप नहीं आता, इसके लिये आपको चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, घबराहट आदि निकालनी पड़ेगी और अपने को एकाग्र करना पड़ेगा। इससे दिनचर्या मजबूत बनती है। सच पूछिये तो आप बेकार काम में भी 'भाव प्रवाह ला सकते हैं। इस कार्य सरलता और खुशी के साथ हो जाता है और कार्य करने के बाद सन्तुष्टि भी मिलती है। कुछ लोग तो शोरगुल के बीच में भी खुद को एकाग्र कर लेते हैं, तो कुछ अपने रोजाना के काम को निपटाने के दिलचस्प तरीके अपनाते हैं, ताकि काम बोझ न बनकर खेल की तरह हो जाये। जैसे- यदि आप एकाउंटेंट हैं, तो आप कोई ऐसी नयी तकनीक सोच सकते हैं, जिससे हिसाब-किताब जल्दी हो और गलतियां होने की गुंजाइश भी कम हो। हमेशा उसी ढंग से विचारों में अपने आपको कैद न रखें, जो परंपरागत रूप से चले आ रहे हैं।
भाव प्रवाह के लिये आप अपना ध्यान सिर्फ अपने काम पर केंद्रित करें, न कि नतीजे पर। वैसे भी उद्देश्य की प्राप्ति की तुलना में असली मजा काम करने में ही आता है। उद्देश्य की प्राप्ति पर उसका अपने ढंग से विश्लेषण करना चाहिये। इससे भी खुशी मिलती है। टोरंटो की यार्क युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने लोगों की पुरानी विचारधाराओं पर परीक्षण किये। परीक्षण के नतीजों से पता चला कि ईमानदारी से जीवन में संतुष्टि आती है। मनोवैज्ञानिकों ने विद्यार्थियों के व्यक्तिगत उद्देश्यों (वजन कम करना, किसी कोर्स को करना, घर वालों से मिलना आदि) और उनकी पूर्ति पर उन्हें होने वाले अनुभवों पर भी परीक्षण किया था। आखिरकार उन्होंने पाया कि मजबूत इरादे वालों को उपलब्धि और उससे प्राप्त प्रसन्नता का जबर्दस्त एहसास होता है।

मैच्योर बनें और वर्तमान में जीयें...

यूं तो आम तौर पर ज्यादा उम्र के लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं और वे अपना समय भी अपने अतीत को सोचते हुए बिताते हैं। मगर शोधकर्ताओं का कहना है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वास्तव में व्यक्ति को पहले की अपेक्षा ज्यादा ख़ुश व संतुष्ट होना चाहिए। न्यूयार्क का। फोर्डम यूनिवर्सिटी ने हाल ही में 25 से 74 साल के बीच के 2727 लोगों पर एक अध्ययन किया। अध्ययन करने से पता चला कि 57 साल से अधिक उम्र वाले अपेक्षाकृत अधिक खुश रहते हैं। इसी तरह का एक अध्ययन स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के लोगों ने भी किया, जिसमें उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि ज्यादा उम्र वाले लोग। नौजवानों की अपेक्षा वर्तमान में ज्यादा जीना पसंद करते हैं। आखिर में | हम यही कहेंगे कि आप अपना समय ऐसे कामों में बितायें, जिससे भावनात्मक पहलू मजबूत बने जैसे- परिवार के साथ ज्यादा रीना गुजारना, दोस्त-यारों, अंतरंगों, मित्रों के साथ रहना आदि। सामा नेटवर्क के विस्तार पर जाने के बजाय संबंधों की गुणवत्ता पर जायें।

COMMENTS

ASE News को फेसबुक पर लाइक करे


Name

5G,1,Adani Group,1,america news,4,Andhra Pradesh,1,animation,1,Arunachal Pradesh,1,Assam,1,Automobiles,9,Beauty,4,best headphones,2,best noise cancelling headphones,2,Bhopal,5,Bhopal News,13,Bihar,3,Bollywood,77,Business,77,Career,7,Chhatishgarh,1,Chhattisgarh,1,coronavirus,6,coronavirus update,3,coronavirus update Bhopal,1,COVID-19,38,Delhi,2,Education,2,Entertainment,82,Food,2,Gadget,3,Gadgets,17,General knowledge,29,Goa,1,Government Jobs,3,Gujarat,6,Hariyana,1,Haryana,1,Health,7,Himachal Pradesh,1,Hollywood,1,India,36,india news,7,India-China LAC tension,10,India-China tension,10,iPhone,1,iphone 12,2,IPL,3,ipo,1,Jharkhand,1,jobs,1,John Abraham,1,Karnataka,1,keral,1,kia sonet,1,latest movie,1,Lifestyle,16,Madhya Pradesh,119,Maharashtra,3,Manipur,1,Meghalaya,1,Mizoram,1,Nagaland,1,Narendra Modi,4,National,38,Navratri,1,nepal news,1,Odisha,1,Opinion,31,Other State,2,Political news,14,Punjab,1,Rajasthan,1,Realme Narzo,1,Realme X3,1,RealmeX3 SuperZoom,1,Reliance industries limited,2,Religion,6,ril,2,Salman Khan,1,Shivraj Singh Chouhan,6,Sikkim,1,Social Media,2,Sports,8,Sports IPL 2020,1,State,77,Stock Market,16,Tech,23,Television,5,Top stories,20,Uattar Pradesh,1,upcoming movie,1,us news,1,us presidential election 2020,1,Uttar Pradesh,8,web series,2,World,17,
ltr
item
ASE News: पैसा खुशहाली की जड़ नहीं है, प्रसन्न रहना ही है सबसे बड़ी दवा
पैसा खुशहाली की जड़ नहीं है, प्रसन्न रहना ही है सबसे बड़ी दवा
The biggest medicine is to be happy by the person, Stand up to the odds, Make you feel healthy, Raise expectations, Be faithful, Avoid loneliness
https://1.bp.blogspot.com/-iiAMUeE733A/XyWdJVqiPWI/AAAAAAAACIw/6cEmLCIK5TsUrZXbFyux08rnaLTePEHXgCPcBGAYYCw/w640-h400/Happy-people.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-iiAMUeE733A/XyWdJVqiPWI/AAAAAAAACIw/6cEmLCIK5TsUrZXbFyux08rnaLTePEHXgCPcBGAYYCw/s72-w640-c-h400/Happy-people.jpg
ASE News
https://www.asenews.in/2020/08/biggest-medicine-is-to-be-happy-by.html
https://www.asenews.in/
https://www.asenews.in/
https://www.asenews.in/2020/08/biggest-medicine-is-to-be-happy-by.html
true
5127568983960262318
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU TAGS ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content