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जब तक सभी लड़कियों को स्कूल ना पहुंचा दे तब तक शिक्षा नीति अधूरी

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School girl drawing
शिक्षा वर्तमान समाज का आवश्यक अंग और इसी समाज का बुद्धि जीव प्राणी मनुष्य का बहुमूल्य गहना भी है। शिक्षा प्राप्त इंसान की मानसिकता, उसका व्यवहार और उसका चलन, हर तरह से भिन्नता लिए होता है। शिक्षा से व्यक्ति का बहुआयामी व्यक्तित्व तो झलकता ही है साथ ही वह अनेक विशेषताओं को पाने के लिए अग्रसर भी रहता है। मुख्यत: भारत में जहां आज भी ऐसे ग्राम, जिला शहर हैं जिनमें लड़कों को शिक्षा का हकदार माना जाता है और वहीं दूसरी ओर लड़कियों को बंधनों में रखा जाता है आज भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों का शिक्षा पाने का अनुपात अधिक है। शिक्षा संबंधी प्रचार-प्रसार का आयोजन करते-करते 65 वर्ष हो गए हैं। करोड़ों अरबों रुपये पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए खर्च किए जा चुके हैं।
परंतु क्या लाभ मिला आज समाज को इन खर्च किए गए धन से। इतना सब खर्च करने के बाद भी आज लड़कियों और स्त्रियों को अपने परंपरागत‌‌ पारिवारिक बंधनों में जकड़ा पाया गया है। आंकड़ों का परीक्षण किया जाए तो साक्षर प्रतिशत उतना ज्ञातव्य नहीं हो सकता है, जितना प्रचार हो गया है। हालांकि कुछ स्तर तक हमने यह देखा है कि निरक्षरता का प्रतिशत कम हुआ है। उदाहरण मिला जैसे महिलाओं में गर्भधारण करने की दर कम हुई है। कम जनसंख्या वृद्धि की दर में प्रभाव आया है। शिशु और बालक मृत्यु दर में परिवर्तन हुआ है। सरकार द्वारा शादी-विवाह की निश्चित आयु रखने से देश की आर्थिक और सामाजिक, आधुनिक क्षेत्रों में स्त्रियों की सहयोगी भावना का उदय हुआ है। वैसे महिलाओं की स्थिति को और अधिक सबल स्वाभिमान, रक्षात्मक बनाने के लिए देश के विद्यालय सांस्कृतिक मूल्यों को आधार बनाकर एक व्यापक और सुदृढ़ प्रतिनिधित्व कर सकते हैं इससे अधिक प्रभावशाली कल देखने को मिल सकेगा।
भारत के अनेक राज्यों में महिलाओं का साक्षर प्रतिशत मात्र 10 प्रतिशत ही आंका गया है। जबकि गांवों का आंकड़ा देखा जाए तो प्रतिशत और इससे कम ही कम मिलेगा। इसका प्रमुख कारण गांवों में बसने वाले नागरिकों की सोच और रुढ़िवादिता है। जो लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने में बाधा बनी हुई है। गांवों में रहने वाली लड़कियों की पढ़ाई को मध्य में छुड़वा दिया जाता है। यहीं नहीं इसका प्रतिशत शहरों में बहुत कम पाया जाता है। इसके अलावा भारत में बसने वाली गरीब और अनुसूचित जाति व जनजाति में शिक्षा का प्रतिशत बहुत कम ही होता है और अगर कहीं पाया जाता भी है तो बहुत आंकड़ों के अनुसार । कक्षा ‌ पहली‌ से कक्षा पांचवीं में भर्ती किए गए छात्रों में से मात्र 17.35 प्रतिशत बच्चे अनुसूचित जाति से संबंध रखते हैं और इस प्रतिशत में 40.39 प्रतिशत लड़कियों का आंका गया है। छठी कक्षा से आठवीं कक्षा तक आते आते लड़कियों का प्रतिशत 32 रह जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार सन् 1986-87 में प्राथमिक तौर पर लड़कों का प्रवेश अनुपात 78-89 था और इसके विपरीत लड़कियों का अनुपात 21-11 आंका गया था। वर्ष 1981-82 में ऐसा ही एक और सर्वेक्षण किया गया जिसमें 55.5 प्रतिशत लड़कियों ने अपनी पढ़ाई मजबूरी में ही त्याग दी। जबकि लड़कों का प्रतिशत 47 प्रतिशत आंका गया।
उच्च प्राथमिक स्तर पर तीन में से एक लड़का और तीन में से दो लड़कियां स्कूलों में प्रवेश नहीं ले पाते हैं। इस अनुपात में लड़कों का पढ़ाई छोड़ने का स्तर नहीं है। स्कूलों में प्रवेश के आंकड़े इस स्थिति को व्यक्त करते हैं कि 1981 में छह से ग्यारह साल के लड़कों के लिए 88.9 प्रतिशत पाया। फिर भी लड़कों की प्रत्येक आयु पर प्रवेश का 54.8 प्रतिशत व लड़कियों का 38.45 प्रतिशत ही रहा है। 11 से 14 साल के आंकड़ों को अगर उठाकर देखा जाए तो यही प्रतिशत लड़कों को 63.8 और लड़कियों का 38.7 रहा है। सन् 1981 में इस संख्या का स्तर बढ़कर 3.75 करोड़ को पार कर गया था तथा पांच से नौ वर्ष की छोटी सी आयु तथा दस से चौदह वर्ष की आयु की कम से कम 65 प्रतिशत लड़कियां साक्षर नहीं है।
अब जो केन्द्र औरचारिक नहीं होते हैं वहां भी लड़कियों का प्रतिशत कम पाया जाता है और अधिकांश लड़कियां शिक्षा धन को न पाये ही अपनी उम्र को पार कर जाती हैं। अब अगर शिक्षा न करवाने के करण खोजे जाए तो यहीं कहा जाएगा कि शरीफ परिवार से संबंध है। या फिर लड़कियों के प्रति धन न खर्च करने की मानसिकता। पढ़ाई का खर्चा तो हर एक आदमी वहन ही कर सकता है। यहां तक उन बच्चों की स्थिति यह है कि वह छोटी से उम्र में ही मेहनत और मजदूरी को अपना मुख्य उद्देश्य समझ बैठते हैं। अगर बच्चें की मां मेहनत मजदूरी करती है तो लड़की को अपने छोटे भाई बहनों को संभालना पड़ता है।
हमारे समाज का मानसिक स्तर सदियों से यह चला आ रहा है कि लड़कियों के ऊपर हर किसी की दृष्टि पड़ती है। तो खतरे पैदा होते हैं इसलिए शिक्षा नहीं दी जाएगी और कौन सी लड़की हमें कमा कर खिला रही है। उसे जाना तो दूसरे के ही घर ही है। उसे पढ़ने लिखने के बाद पति की सेवा और घर के काम ही करने हैं। अगर उसे शिक्षा लेनी ही है तो गृह कार्य में दक्ष होने की शिक्षा जरूर ले लें। और आज शहरों में ऐसे लोग है जो लड़कियों की सह शिक्षा पर विरोध करते हैं। उनके अगर लड़के मित्र है तो उनको चरित्र से गिरा हुआ माना जाता है। अंततः यहीं होता है कि पढ़ाई बीच में ही बंद करवाकर शादी कर दी जाती है । इससे लड़कियों की मानसिकता का पौधा वहीं पर दम तोड़ देता है। वह अपने पति, बच्चे व परिवार को सम्भालने में ही रह जाती है।
ये कदापि नहीं है कि बिना पढ़ी लिखी महिलाएं समझदार नहीं होती है। परंतु शिक्षा एक शस्त्र के रूप में काम आने वाला तीर है। आज का दौर कागज पर काम करने का है। मौखिक रूप से कार्य होना याने जालसाजी की संज्ञा को सार्थक करना होता है। साक्षर न होने से निरक्षर व्यक्ति हर जगह धोखे खा सकता है। आज जितनी जरूरत लाठी की है। उससे कहीं अधिक आवश्यक कलम है और इस कलम का यह हक केवल पुरुषों के हाथों में रहेगा तो पुरुष तो चाहेंगे कि स्त्री आगे बढ़े ही नहीं। वो अपने नियमों के अनुसार काम को करवायेंगे। आज शिक्षा सबका अधिकार है।
शिक्षा से स्त्री अपने बच्चों को भी साक्षर बना सकती है। उनका लालन पालन उचित तरीके से भी कर सकती है और वह एक आदर्श मां बन सकती है। इससे उसके ही बच्चे उसे अपना भाग्य निर्माता मानेंगे। आज सरकार से लेकर समाज के हर व्यक्ति का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह महिलाओं की अच्छी शिक्षा का स्तर उठा सकने में अपना भरपूर योगदान दे सकें। स्कूलों में शिक्षा का स्तर उठा सकने में अपना भरपूर योगदान दे सकें। स्कूलों में शिक्षा का स्तर प्रभावी हो। उन्हें सहयोग की भावना से आत्मनिर्भर बनाया जाए घर के कार्यों में एक सीमा तक ही उनसे काम करवाया जाए। यही नहीं ज्यादा से ज्यादा शिक्षा की और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर ध्यान आकृष्ट करवाया जाए। नियमित रूप से काम आने वाली जरूरी बातों को शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए। तब जाकर कहीं हम एक सबल राष्ट्र का निर्माण कर पाएंगे और भारत को विश्व में अपनी संस्कृति सम्मान को अनोखा दर्जा दिला सकने में कामयाब  हो पाएंगे।

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ASE News: जब तक सभी लड़कियों को स्कूल ना पहुंचा दे तब तक शिक्षा नीति अधूरी
जब तक सभी लड़कियों को स्कूल ना पहुंचा दे तब तक शिक्षा नीति अधूरी
New Education policy incomplete until all girls have access to school, It has been 65 years of organizing education related propaganda.
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