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संविधान के मजबूत प्रहरी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

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Narendra Modi
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. भीमराव आम्बेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कहा जाता है। डॉ. अम्बेडकर न्याय के प्रहरी थे। वे दलित मानव कल्याण के मूलभूत सिद्धांत को अपनाकर, उनमें जागृति पैदा कर समाज के प्रतिनिधि बन गए। डॉ. अम्बेडकर अंधकारग्रस्त सामाजिक मानवता के लिए अमर ज्योति हैं। डॉ. अम्बेडकर भारत के भव्य भाल पर एक सुरम्य तिलक हैं। उनकी सत्यनिष्ठा एवं दृढ़ता ने उन्हें असाधारण बना दिया। डॉ. अम्बेडकर कोरे आदर्शवादी स्वप्नदृष्टा नहीं थे।

भारत वर्ष के सम्पूर्ण देशवासियों के लिए आज गौरव का दिन है। दुनिया के  सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में आज ही के दिन 70 वर्ष पूर्व संविधान की रचना की गई थी। संविधान भारत का राजधर्म है। संविधान का निर्माण 1946 में गठित संविधान सभा ने किया था। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को उनका मौलिक अधिकार प्रदान करता है। यह भी हमारे लिए गर्व की बात है कि हमें और हमारे देश को एक श्रेष्ठ मार्गदर्शक श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में मिले हैं। हमारे समाज को इस बात की जानकारी तो थी कि भारत का संविधान दुनिया का श्रेष्ठ संविधान है लेकिन संविधान निर्माण से लेकर उसकी तिथि से भारतीय समाज आज से पांच वर्ष पहले तक अनजान था। सरकारें सत्तासीन और सत्ताहीन होती रहीं लेकिन किसी ने भी हमारे संविधान की महत्ता को बताने लिए कोई तिथि निर्धारित नहीं की। इस ओर सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही ध्यान गया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज से पांच वर्ष पूर्व वर्ष 2015 में प्रतिवर्ष 26 नवम्बर को संविधान दिवस मनाये जाने निर्णय लेकर देश के एक एक नागरिक को गर्व से भर दिया।  प्रधानमंत्री श्री मोदी ने 11 अक्टूबर, 2015 को मुंबई में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा का शिलान्यास करते हुए एलान किया कि 26 नवंबर संविधान दिवस के रूप में मनाया जाएगा। आज जब हम 71वें संविधान दिवस मना रहे हैं तब हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारा संविधान पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भारतीय संविधान के मजबूत प्रहरी हैं। 

भारतीय संविधान के प्रति पिछले वर्षों में जो आस्था और विश्वास का नवीन संचार हुआ है उसने विश्व में प्रतिष्ठा अर्जित की है। संविधान सभा ने 22 जनवरी, 1947 को पारित संविधान के उद्देश्य में कहा गया था कि ‘यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शांति व मानव कल्याण के लिए पूरा सहयोग देगी।’ संविधान निर्माण प्रारूप समिति के सभापति डॉ. बी.आर. आंबेडकर का काम विशिष्ट था। डॉ. आंबेडकर ने सभा में कहा था, ‘जो लोग संविधान से असंतुष्ट हैं, उन्हें केवल दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना है। यदि वे निर्वाचित संसद में दो-तिहाई बहुमत भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं तो यह नहीं समझा जा सकता कि जनसाधारण असंतोष में उनके साथ है।’ सभा ने विभिन्न विषयों पर 17 समितियां गठित की थीं। 

डॉ. आम्बेडकर की यह बात आज भी उतनी ही कारगर है जब उन्होंने संविधान निर्माण के समय कही थी। उनका कहना था कि संविधान की शक्ति उसके संचालन में है। आज हम गर्व से कह सकते हैं कि वर्तमान मोदी सरकार ने संविधान की रक्षा करने और उसे अधिक शक्ति के साथ प्रतिष्ठापित करने में अहम भूमिका निभाई है। संविधान में निहित सभी उद्देश्यों को लोकहित में पूर्ण किया है और भारत के नागरिकों को इस बात की दिलासा दिलायी है कि उनके मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं किया जाएगा। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि हमारा संविधान वैश्विक लोकतंत्र की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है. यह न केवल अधिकारों के प्रति सजग रखता है, बल्कि हमारे कर्तव्यों के प्रति हमें जागरूक भी बनाता है। मोदी ने कहा कि पूरी दुनिया जब अधिकारों की बात कर रही थी, तब गांधीजी ने एक कदम आगे बढक़र नागरिकों के कर्तव्यों के बारे में बात की। संविधान की भावना अटल और अडिग रही है। अगर कभी इसे डिगाने के कुछ प्रयास हुए भी हैं, तो देशवासियों ने मिलकर उनको असफल किया है, संविधान पर आंच नहीं आने दी है। हम हमारे संविधान की मजबूती के कारण ही एक भारत, श्रेष्ठ भारत की तरफ आगे बढ़े हैं। हमने तमाम सुधार मिल-जुलकर संविधान के दायरे में रहकर किए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संविधान के प्रति जो आस्था और विश्वास जागा है, वह इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। धारा 370 को लेकर जो धारणा बनी हुई थी, उसके समाप्त होते ही आम भारतीय को ज्ञात हुआ कि संविधान का दुरूपयोग किस तरह से किया जा रहा था। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है, महज वाक्य था लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कागज से निकालकर सच कर दिखाया है। आज हम कह सकते हैं कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत सचमुच में एक है।

भारतीय संविधान की आत्मा में सामाजिक समरसता मूल में है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ की जो अवधारणा मोदी सरकार में बनी है, वह संविधान के अनुरूप है। बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द को शामिल करने पर विरोध दर्ज किया था।

भारतीय संविधान में सामाजिक समरसता की भावना को भी आघात पहुंचाया गया। वर्ष 1956 में बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने से उनका अनुसूचित वर्ग का दर्जा समाप्त कर दिया गया था। तब से लेकर 1990 तक अनुसूचित वर्ग अपना दर्जा प्राप्त करने व आरक्षण पाने के लिए लड़ता रहा लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 1990 में तत्कालीन जनता दल सरकार ने संविधान में संशोधन कर पुन: अनुसूचित जाति को उनका हक दिलाया। इसी तरह 1989 मे अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचारण निवारण कानून बनाया गया था लेकिन सख्ती के साथ इस कानून को अमल में लाने में कई तरह की समस्या थी। किन्तु 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार आयी तब 2015 में अपेक्षित संशोधन कर कानून को सख्त बनाया ताकि इन वर्गों के साथ अन्याय नहीं हो सके। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सामाजिक समरसता का संदेश देते हुए दो माह के भीतर न्याय दिलाने की व्यवस्था की। 

हमें इस बात का भी स्मरण रखना होगा कि पिछली सरकारों ने राज्य विधानसभाओं को भंग करने वाले अनुच्छेद 356 का लगभग सवा सौ बार दुरुपयोग किया। 1975 में की गई आपातकाल की उद्घोषणा अनुच्छेद 353 का घोर उल्लंघन थी। न्यायालयों की शक्ति घटाई गई। न्यायायिक पुनरावलोकन को कमतर किया गया। अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के बाद आम लोगों को पता चला कि किस तरह कश्मीर पर गलत ढंग से राज किया जा रहा था। 

भारतीय संविधान में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। यह लोकतंत्र का आधार है। आवश्यक है कि हम विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दायरे में रखकर उसका पालन करें। संविधान के उद्देश्य में सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, समता व बंधुता के राष्ट्रीय संकल्प हैं। इसके अनुसार संविधान की सर्वोपरिता का मुख्य शक्ति स्रोत ‘हम भारत के लोग’ हैं। संविधान निर्माताओं ने दुनिया के कई संविधानों से अनुभव लिए। आयरलैंड से राज्य के नीति निदेशक तत्वों एवं संसदीय प्रणाली ब्रिटिश परंपरा का अनुभव है। मूल अधिकार अमेरिकी संविधान के अनुभव हैं। वैसे प्राचीन भारत में लोकतंत्र व नीति निदेशक तत्वों जैसी धारणा पहले भी थी। 

मूल कर्तव्यों की सूची में पहला कर्तव्य है-‘संविधान का पालन करें। संविधान (अनुच्छेद 51ए) में मूल कर्तव्यों की सूची है। पहला कर्तव्य है-‘संविधान का पालन करें। उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र-ध्वज व राष्ट्र-गान का आदर करें।’ दूसरा कर्तव्य सांस्कृतिक है, ‘स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शों का पालन करें।’ तीसरे कर्तव्य में देश की एकता, संप्रभुता व अखंडता की रक्षा है। सार्वजनिक संपदा की सुरक्षा भी मूल कर्तव्य है। सामाजिक संस्कृति की परंपरा का संवर्धन भी एक कर्तव्य है। सामाजिक संस्कृति’ शब्द के भ्रम को सर्वोच्च न्यायालय ने दूर किया था ‘कि सामाजिक संस्कृति का आधार संस्कृत भाषा और साहित्य है। यही विभिन्न जनों को एक सूत्र में बांधती है।’ 

यह बात बहुत कम लोग को ज्ञात है कि भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। इसी आधार पर भारत को दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र कहा जाता है। भारतीय संविधान में 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां शामिल हैं। यह 2 साल 11 महीने 18 दिन में बनकर तैयार हुआ था। जनवरी 1948 में संविधान का पहला प्रारूप चर्चा के लिए प्रस्तुत किया गया। 4 नवंबर 1948 से शुरू हुई यह चर्चा तकरीबन 32 दिनों तक चली थी। इस अवधि के दौरान 7,635 संशोधन प्रस्तावित किए गए जिनमें से 2,473 पर विस्तार से चर्चा हुई। भारतीय संविधान की मूल प्रति हिंदी और अंग्रेजी दोनों में ही हस्तलिखित थी। इसमें टाइपिंग या प्रिंट का इस्तेमाल नहीं किया गया था। दोनों ही भाषाओं में संविधान की मूल प्रति को प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने लिखा था। उन्होंने नंबर 303 के 254 पेन होल्डर निब का इस्तेमाल कर संविधान के हर पेज को बेहद खूबसूरत इटैलिक लिखावट में लिखा है। इसे लिखने में उन्हें 6 महीने लगे थे। 


(लेखक भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है)

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