सरहद पर गूंज रहा जबलपुर का गोला बारूद

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Jabalpur

देश की सैन्य ताकत की बात करें तो यह जबलपुर के बिना अधूरी है।सेना को युद्ध के मोर्चे पर उपलब्ध किए जाने वाले गोला बारूद से लेकर सैन्य वाहन, तोप सब जबलपुर में उत्पादित किए जा रहे हैं।1904 में स्थापित गन कैरिज फैक्टरी (जीसीएफ) हो या फिर सेना को युद्धक मोर्चे पर उपयोगी सैन्य वाहनों की आपूर्ति कराने वाली 1969 में स्थापित की गई वाहन निर्माणी जबलपुरा(वीएफजे)।देश की आजादी के पूर्व स्थापित आर्डिनेंस फैक्टरी खमरिया (ओएफके) अपने स्थापना काल से ही सेना को गोला - बारूद उपलब्ध करा रही है। देश में स्थापित की गई 41 आयुध निर्माणियों में अकेले 4 जबलपुर जिले में हैं।कटनी जिला बनने के पहले जबलपुर के नाम यह गौरव 5 आयुध निर्माणियों को होने का था।1972 में स्थापित की गई धूसर लोहा फाउंडरी(जीआईएफ) बमों की खोल सहित सैन्य वाहनों के उपयोगी कलपुर्जा का निर्माण कर रही है। जीसीएफ के नाम सबसे बड़ी उपलब्धि तब सामने आई जब यहां की बनी धनुष और सारंग तोप सरहद पर गरजने लगीं। देश की सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली धनुष तोप इसी निर्माणी की देन है।आयुध निर्माणी खमरिया में बने क्लस्टर बमों ने दुश्मनों को हर मोर्चे पर पटखनी देने का काम किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान पर की गई एयर स्ट्राइक में उपयोग किए गए थाउजन पाउण्डर बमों का उत्पादन भी आर्डिनेंस फैक्टरी खमरिया में किया जा रहा है।इसके अलावा अन्य सैन्य ठिकानों में 506 आर्मी बेस वर्कशॉप, सेंट्रल आर्डिनेस डिपो सहित सैन्य टुकड़ियों जम्मू एण्ड कश्मीर राइफल्स, ग्रेनेडियर्स रेजिमेंटल सेंटर सहित सबसे अप - टू - डेट माने जाने वाले सिग्नल कोरका रीजनल मुख्यालय भी जबलपुर में ही है
साल था 1942 जब भारत में उथल - पुथल मची हुई थी।देश इतिहास के बहुत महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में अविभाजित भारत की जनता अंग्रेजी हुकुमत से लोहा ले रही थी। ऊधर अंग्रेजी हुकुमत के सामने द्वितीय विश्व युद्ध का संकट आ खड़ा हुआ था।ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे चमकीले नगीने भारतवर्ष को आक्रांताओं से बचाने के लिए उसे भारी मात्रा में असलहे और गोला - बारूद की आवश्यकता थी।जापानियों का जोश चरम पर था और वह पूर्वी एशिया की जमीन को रौंदते हुए बर्मा की सीमा पर आ पहुची थी। युद्ध सामग्री को यूरोप से लाना मुश्किल था ऐसे में मिस्टर क्लॉउड ऑकिन्ले भारत सेना के कमांड इन - चीफ थे। उन्होंने मशविरा दिया कि भारतीय सेना के बड़े स्तर पर आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। मिस्टर चैटफील्ट  की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने भी तत्कालीन आयुध निर्माणियों बड़े स्तर पर आधुनिकीकरण की संस्तुति की थी। भारत गोला - बारूद उत्पादन के विस्तार के उद्देश्य से ब्रिटेन आपूर्ति मंत्रालय ने सर अलेक्जेंडर रोजर के नेतृत्व में सन 1940 में एक टेक्नीकल मिशन भारत भेजा। इसकी संस्तुति ईस्टर्न ग्रुप ऑफ प्रोजेक्टस के तहत आठ नई निर्माणियों स्थापना खड़की 1940, खमरिया 1941, कटनी 1941, कानपुर दो निर्माणियां क्रमशः 1941 एवं 1943, देहरादून 1943, मुरादनगर 1943 और अंबरनाथ 1944 में हुई थी।
सन 1941-42 के दरमियान आयुध निर्माणी के लिए भूमि के अधिग्रहण का कार्य किया गया। जिसमें नौ गांवों खमरिया, तिघरा, झिरिया चंदौली, मोहनिया, भर्गवा, रांझी, मानेगांव और घाना की शासकीय एवं निजी स्वामित्व की भूमि का अधिग्रहण किया गया। वर्तमान में आयुध निर्माणी खमरिया के स्वामित्व में लगभग 4200 एकड़ रक्षा भूमि है। महानिदेशक इंजीनियरिंग प्रोडक्शन के अधीन निदेशक ऑर्डिनेन्स सर्विसेस और महानिदेशक म्यूनिशन प्रोडक्शन का इस निर्माणी पर संयुक्त नियंत्रण रहा। एफव्हाईली दिनांक 01-02 1942 को आयुध निर्माणी खमरिया के सुपरिन्टेन्डेन्ट बने। उस समय विस्थापित लोगों को आसपास बसाया गया था।
गांवों के घरों, मंदिरों, कुओं आदि के अवशेष अभी भी निर्माणी परिसर में देखे जा सकते हैं। मंदिरों में आज भी कर्मचारियों द्वारा पूजा - पाठ किया जाता है। बैलगाड़ियों और तांगों का दौर होने के कारण और आसपास धना जंगल होने के कारण आसपास उत्पादन का उपलब्ध तकनीक और हाथ से किया जाता था । कुशल कामगारों की कमी होने के कारण आसपास उपलब्ध जनसंख्या से ही लोग भर्ती किए जाते थे । कुछ लोगों का चयन करके उन्हें यूरोप की फैक्ट्रियों में ट्रेनिंग दिया जाता था। 
1947 में आजादी के बद आयुध निर्माणी खमरिया सीमा पर ड्टी थल सेनाओं, वायु सेना तथा नौ सेना को 1962,1965,1971 कारगिल युद्ध तथा जब भी आवश्यकता हुई। अतिरिक्त कार्य करके गोला - बारूद की कमी नहीं होने दी। जिससे दुश्मन को हमेशा मुंह की खानी पड़ी। हमारे दुश्मन जानते हैं कि भारत के मध्य में उनकी पहुंच से दूर आयुध कार्मिकों की फौज खमरिया में है जो कभी भी आग उगल सकती है। इस निर्माणी में कभी 30,000 से ज्यादा कार्मिक थे। जो आज घटकर लगभग 5,500 रह गए हैं। अब बहुत सा काम आधुनिक मशीनों से और अत्यंत कुशल अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किया जाता है।थल सेना के लिए 30 एमएम बीएमपी, 40 एमएम एल -70, रॉकेट 84 एमएम एम्यूनिशन, कैंडल स्मोक, 125 एमएम एम्यूनिशन, हैंड ग्रेनेड, चार्ज डेमोलिशन, नौसेना के लिए एके 630 एम्यूनिशन, पीबीजीमाईन, 76.2 एम्यूनिशन, एसआरजीएम एम्यूनिशन, डेप्थ चार्ज एवं विभिन्न वॉर हेड व वायु सेना के लिए विभिन्न प्रकार के बम जैसे 1000 पौंड, 450 केजी, 250 केजी, 100-120 केजी और 25 पौंडर एवं 30 एमएम ऐडन एवं विभिन्न पॉवर कार्टेज बनाए जाते हैं। अन्य पैरामिलेट्री फोर्सेस के लिए 7.62 एमएम ड्रिल, 0.303 बैलेसटाईट, बीडी आरएसीटीएनए ग्रेनेडरॉईफल, विभिन्न स्विचेस बनाए जाते हैं।इस निर्माणी में अत्याधुनिक टैंक रोधी एम्यूनिशन बनाए जाते हैं।
बदली हुई परिस्थिति में ओएफके 
भारत सरकार की सामरिक जरूरतों और योजनाओं के अनुरूप आधुनिकीकरण के नए दौर में हैं। निर्माणी के कार्मिक रोज खतरों से खेलते हैं और उच्च दर्जे के संरक्षा उपकरणों का उपयोग व नियमों का पालन करते हैं।  उपयोग में लाया जाने वाला बारूद व रसायन इतना संवेदनशील होता है कि कंपन या घर्षण मात्र से उसमें विस्फोट हो सकता है।इसलिए निर्माणी के ऊपर का वायु क्षेत्र छव सर्ल वदम में आता है जिससे कोई भी वायुयान या हेलिकाप्टर नहीं गुजर सकता है।पास ही लॉग प्रफ रेंज में जब कभी बड़े बड़े गोलों की फायरिंग होती है, तो लगता है पास ही कहीं युद्ध हो रहा है।
पूरी फैक्टरी तीन बड़ी निर्माणियों के बराबर ओएफके
परिसर में लेखा कार्यालय, आंतरिक "ऑडिट सेल, वैमानिकी गुणवत्ता आश्वासन, आयुध, नौसेना आयुध निरीक्षणालय, वरिष्ठ गुणवत्ता आश्वासन स्थापना, आयुध एवं एलपीआर, गुणवत्ता आश्वासन स्थापना, सैन्य विस्फोटक के कार्यालय एवं बैंक ऑफ इंडिया का विस्तार पटल भी हैं जो कि निर्माणी को अपना बहुत ही महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। इसके अलावा प्रशिक्षण के लिए ओएफएलआई जिसमें ट्रेड अप्रेन्टिसों को प्रशिक्षण दिया जाता है। निर्माणी परिसर में ही एक अत्यंत ग्रामीण एवं प्राचीन दुर्गा मंदिर भी है, कहा जाता है कि अंग्रेजों को उसके बाजू से रेलवे लाइन निकालने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। जब तक उन लोगों ने इस मंदिर में अपना माथा नहीं टेका। तब तक रेलवे लाइन नहीं निकल पाई।एक्सप्लॉसिव डिपो खमरिया में निर्माणी में बनाए गए गोला - बारूद रखे जाते हैं, जहां वन्य प्राणी भी बहुतायत में देखने मिलते हैं।

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