इंटरनेट वर्ल्ड में बुक्स का रूप बदला, इंपॉर्टेंस नहीं

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Books day
23 अप्रैल, 1564 को लेखक शेक्सपीयर ने दुनिया को अलविदा कह दिया था. उन्होंने अपने पूरे जीवन में करीब 35 नाटक और 200 से ज्यादा कविताएं लिखी. यूनेस्को ने 1995 से और भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को वर्ल्ड बुक डे के रूप में मनाने की घोषणा की.

 पुस्तकें मित्रों में सबसे शांत व स्थिर हैं, वे सलाहकारों में सबसे सुलभ व बुद्धिमान हैं और शिक्षकों में सबसे धैर्यवान हैं. चार्ल्स विलियम इलियट की कही यह बात पुस्तकों की महत्ता को उजागर करती है. निस्संदेह पुस्तकें ज्ञानार्जन करने, मार्गदर्शन करने एवं परामर्श देने में विशेष भूमिका निभाती हैं. पुस्तकें मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक, चारित्रिक व्यवसायिक एवं राजनीतिक विकास में सहायक होती हैं. दरअसल, 23 अप्रैल, 1564 को एक ऐसे लेखक ने दुनिया को अलविदा कहा था, जिनकी कृतियों का विश्व की समस्त भाषाओं में अनुवाद हुआ. यह लेखक थे शेक्सपीयर, जिसने अपने जीवनकाल में करीब 35 नाटक और 200 से अधिक कविताएं लिखीं. साहित्य जगत में शेक्सपीयर को जो स्थान प्राप्त है उसी को देखते हुए यूनेस्को ने 1995 से और भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की.
भले ही आज के इंटरनेट फ्रेंडली वर्ल्ड में सीखने के लिए सब कुछ इंटरनेट पर मौजूद है लेकिन इन सबके बावजूद जीवन में पुस्तकों का महत्व आज भी बरकरार है, क्योंकि किताबें बचपन से लेकर बुढ़ापे तक हमारे सच्चे दोस्त का हर फर्ज अदा करती आई हैं. बचपन में मां और परिवार से सीखने के बाद जब बच्चा स्कूल जाता है तब उसकी मुलाकात किताबों से होती हैं जो उसे जीवन की वास्तविकता से मिलवाती हैं और जीने की कला सिखाती हैं और जब उम्र का सफर पार करते हुए व्यक्ति बुढ़ापे की तरफ बढ़ता है तब भी ये किताबें ही
उसके अकेलेपन को साझा करती हैं.. महात्मा गांधी ने कहा है, 'पुस्तकों का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि पुस्तकें अन्तःकरण को उज्ज्वल करती हैं.' डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शब्दों में, 'पुस्तकें वे साधन हैं, जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं.' पुस्तक की महत्ता को स्वीकारते हुए लोकमान्य तिलक कहते हैं कि मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूंगा क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहां ये होंगी वहां अपने आप स्वर्ग बन जाएगा.
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पुस्तकों के महत्व पर लिखा है कि तोप, तीर, तलवार में जो शक्ति नहीं होती; वह शक्ति पुस्तकों में रहती है. तलवार आदि के बल पर तो हम केवल दूसरों का शरीर ही जीत सकते हैं, किंतु मन को नहीं. लेकिन पुस्तकों की शक्ति के बल पर हम दूसरों के मन और हृदय को जीत सकते हैं. ऐसी जीत ही सच्ची और स्थायी हुआ करती है, केवल शरीर की जीत नहीं! वस्तुतः पुस्तकें सचमुच हमारी मित्र हैं. वे अपना अमृतकोश सदा हम पर न्योछावर करने को तैयार रहती हैं. उनमें छिपी अनुभव की बातें हमारा मार्गदर्शन करती हैं.
कठिन से कठिन समय में भी पुस्तकें हमारा उचित मार्गदर्शन करती हैं। जिन लोगों को पुस्तकें पढ़ने का शौक होता है, वे लोग अपने खाली समय का सदुपयोग पुस्तकों के जरिए ज्ञानार्जन के लिए करते हैं. पुस्तक पढ़ने की रुचि का विकास बचपन से ही होने लगता है. यदि बाल्यावस्था में बच्चों को अच्छी
पुस्तकें उपलब्ध नहीं होतीं, तो भविष्य में उनमें इस रुचि का विकास नहीं हो पाता, इसलिए जो लोग चाहते हैं कि उनके बच्चों में पुस्तक पढ़ने की अच्छी आदत का विकास हो, वे अपने बच्चों को समय-समय पर अच्छी पुस्तकें लाकर देते रहते हैं. बच्चों के लिए पुस्तकों के महत्व को देखते हुए, प्राचीन काल से ही बाल पुस्तकों के लेखन पर ध्यान दिया जाता रहा है. 'पंचतंत्र' एवं 'हितोपदेश' इसके उदाहरण हैं.
पुस्तकें ज्ञान का संरक्षण भी करती हैं. किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति के संरक्षण एवं उसके प्रचार-प्रसार में पुस्तकें अहम भूमिका निभाती हैं. रेने डकार्टेस ने कहा भी है, 'सभी अच्छी पुस्तकों को पढ़ना पिछली शताब्दियों के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ संवाद करने जैसा है.' और सचमुच प्राचीन काल के बारे में जानने का सबसे अच्छा स्रोत पुस्तकें ही होती हैं. वैदिक साहित्यों से हमें उस काल के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पहलुओं की जानकारी मिलती है. पुस्तकें इतिहास के अतिरिक्त विज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार में भी सहायक होती हैं. विश्व की हर सभ्यता के विकास में पुस्तकों का प्रमुख योगदान रहा है. मध्यकाल में पुनर्जागरण में भी पुस्तकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी पुस्तकों ने अग्रणी भूमिका अदा की पुस्तकें शिक्षा प्रदान करने का प्रमुख साधन है. पुस्तकों के बिना शिक्षण की क्रिया अत्यन्त कठिन हो सकती है. कई मामलों में तो पुस्तकों के अभाव में शिक्षण की कल्पना भी नहीं की जा सकती. पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त पूरक पुस्तकों की भी व्यवस्था विद्यार्थियों के विकास के लिए की जाती है. पाठ्य पुस्तकें जहां छात्रों को पाठ्यक्रम संबंधी जानकारी देती हैं, वहीं पूरक पुस्तकें छात्रों में स्वाध्याय की योग्यता विकसित करने में सहायक होती हैं.
 *23 अप्रैल, 1564 को लेखक शेक्सपीयर ने दुनिया को अलविदा कह दिया था. उन्होंने अपने पूरे जीवन में करीब 35 नाटक और 200 से ज्यादा कविताएं लिखी. यूनेस्को ने 1995 से और भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को वर्ल्ड बुक डे के रूप में मनाने की घोषणा की.*

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