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Madhya Pradesh: आदिवासी छात्रों से फीस के नाम 25 जगह 925 रुपए वसूले गए?

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अनेकों वित्तीय अनियमितताओं के आरोपी को आखिर किसका संरक्षण?शहडोल। एक सरकारी स्कूल के प्रभारी प्राचार्य ने गजब के गुल खिलाए. उसके करतबों को देखकर हैरानी

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Brajeshwar dubey

अनेकों वित्तीय अनियमितताओं के आरोपी को आखिर किसका संरक्षण?

शहडोल। एक सरकारी स्कूल के प्रभारी प्राचार्य ने गजब के गुल खिलाए. उसके करतबों को देखकर हैरानी भी होती है और परेशानी भी. यह तो गनीमत है कि अनुसूचित जनजाति जो विशेष श्रेणी में आती है के छात्रों के साथ भी फीस के नाम पर जब खुल्लम खुल्ला कपट किया तो पहली बार लोगों को समझ आया. सभी को लगा कि इनकी दूसरी करतूतों की चर्चाओं में भी कुछ न कुछ तो सच्चाई होगी ही. इनके ठाठ देखकर लोग पहले ही हैरान थे कि एक अदना सा कर्मचारी जिनका नाम ब्रजेश्वर दुबे है जो कभी शिक्षा कर्मी की नियुक्ति पाने के लिए दर-दर भटकते थे फर्जीवाड़ा कर बिना विकलांगता के विकलांग कोटे से नौकरी मिलते ही कैसे सीढ़ियों की बजाए लिफ्ट से ऊपर पहुँच गया. 
हैरानी की बात यह है कि इसकी कलाकारी की बातें प्याज के छिलकों की तरह उतरती जाती है और लेकिन छिलके कम होने का नाम ही नहीं ले रहे. सूत्रों से पता चला है कि इनका घर संभाग मुख्यालय में है लेकिन साल 1998 में सरकारी नौकरी को ग्रामीण इलाके के नाम से हथियाई.  लेकिन बाद में इसी विकलांगता को आड़ बनाकर वह गोटी बिठाकर शहरी क्षेत्र में आ गया वह भी अपनी मनपसंद स्कूल में. पता चला है कि पहले इनकी पोस्टिंग शहडोल से करीब 50 किमी दूर ग्रामीण इलाके के स्कूल चुहिरी में सरकारी शर्तों के अधीन थी. नौकरी मिलते ही इसे भुई बाँध का स्कूल दिखने लगा. आनन-फानन में इसके लिए कोशिशें की लेकिन कई तरह की अड़चनों को आता देख फिर विकलांगता का फर्जीवाड़ा किया और गाँव से शहर के करीब आ पहुंचा. इसको लेकर जाँच भी हुई जिसमें भी इस बात का जिक्र है कि इनका विकलांग प्रमाण-पत्र जांचा जाना चाहिए. 
इतना ही नहीं सूत्र बताते हैं कि भुई बाँध पहुंच कर इनका नाता निरा आदिवासी गांव के बच्चों की पढ़ाई की तरफ होता तो भी बात समझ आती लेकिन वहां पहुंचते ही इसकी लक्ष्मी की खनक का चस्का सिर चढ़ बोलने लगा कि रोज कमाने खाने वाले खालिस आदिवासी वो भी मजदूरों की खून, पसीने की गाढ़ी कमाई को भी हड़पने में कोई कसर नहीं छोड़ी. हद तो तब हो गई जब मप्र बोर्ड की परीक्षा के नाम पर सरकार द्वारा तय केवल पच्चीस रुपए की फीस की जगह इसने छात्रों से 900 रुपए की भारी भरकम राशि वसूल ली.  

फीस बढ़ाकर लेने की जांच में सत्यता पाई गई

शुरू में छात्र कुछ समझ पाते इसके लिए कई तरह की भूमिकाएं बांधी गईं. आखिर साल खराब होने से डरे अभिभावकों ने किसी तरह 25 की बजाए 925 रुपए की फीस तो भरी लेकिन कई ने इसकी शिकायत कमिश्नर शहडोल के यहाँ की जिसके बाद संभाग का शीर्षस्थ प्रशासनिक अमला हरकत में आया और तत्काल जाँच शासकीय विद्यालय विचारपुर के संस्था प्रमुख को दी गई. पता चला है कि अपनी दो पेज की जाँच में जाँचकर्ता प्राचार्य डीएस पुट्टा ने इस बात की सत्यता पाई कि कैश बुक तथा शाला प्रबंधन समिति के नाम पर कई तरह के विदड्रावल बड़ी धोखाधड़ी से किए गए हैं. 
जाँच से बैखोफ इस प्रभारी ने न तो कभी खुद की शिकायतों को तवज्जो दिया और न गंभीरता से लिया.बताते हैं कि उल्टा जाँच अधिकारी पर ही जब-तब फब्तियां कसता यह अदना सा कर्मचारी शिक्षा के नाम पर अंधेरगर्दी की हदें पार करता रहा. अभी भी भुई बाँध के कथित प्रभावशाली प्रभारी ने अपनी हेकड़ी नहीं छोड़ी और मामले को ठण्डे बस्ते में डालने के लिए दूसरे तरह के हथकण्डे अपनाने शुरू कर दिए. पता चला है कि मामला केवल बैगा छात्रों से अनाप-शनाप वसूली भर का नहीं है. इसने विद्यालय के विभिन्न मदों में आई भारी भरकम राशि का भी इसी तरह मनमानी पूर्वक दुरुपयोग किया है.  
इस संबंध पता चला है कि 1998 में विकलांग कोटे से शिक्षा कर्मी वर्ग 1 का पद हथियाया यह कर्मचारी कई तरह के हथकण्डों को अपनाकर भुईबांध के हायर सेकेण्डरी स्कूल का प्राचार्य का पद हथिया रखा है. जबकि ग्रामीण क्षेत्र में सरकार शिक्षा को लेकर पहले से ही काफी प्रयासरत है. ऐसे में कम से आदिवासी अंचल में तो एक पूर्ण प्राचार्य को नियुक्त करना चाहिए. लेकिन इसने ऐन-केन-प्रकारेण खुद ही को प्राचार्य घोषित करा लिया और अब तक न जाने कितने कारनामें किए हैं जिससे जहाँ संस्था की छवि पर तो भारी पड़ ही रहा है वहीं इसकी करतूतों ने सबको हैरान कर रखा है. प्रभारी प्राचार्य रहते हुए  वह दुस्साहस कर दिखाया जिससे लगता है कि या तो इसकी करतूतों से विभागीय वरिष्ठजन अनभिज्ञ हैं या फिर निश्चित रूप से कहीं न कहीं मूक सहमति है. जाहिर है अंधे के हाथ बटेर लग गई तो फिर पूछना क्या.
पता चला है कि संस्था के कर्मचारियों तथा दूसरे जरूरी कार्यों को निपटाने के लिए वित्तीय अधिकार कागजों में खण्ड शिक्षा अधिकारी के पास है लेकिन वास्तव में अब तक संदर्भित वित्तीय आहरण यही करता है. ऐसे में सवाल उठ खड़ा हुआ है कि खण्ड शिक्षा अधिकारी के अधिकारों का इसने कैसे अतिलंघन कर लिया? हैरानी की बात यह है कि इस संबंध में अनुसूचित जाति विकास विभाग के उपायुक्त का स्पष्ट भी कैसे दरकिनार हो गया जिसमें कहा गया है कि संस्था के प्रभारी प्राचार्य का दायित्व संस्था में पदस्थ वरिष्ठ शिक्षक निभाएगा जिसे इस संबंध में प्रशासनिक अधिकार तो होगा लेकिन वित्तीय प्रभार विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी के पास रहेगा. लेकिन हैरानी की बात है कि इस कथित प्रभारी ने दोनों ही काम करना शुरू कर दिया. 
कागजों में तो खुद को विकलांग बताना वाला यह कर्मचारी  बाइक से फर्राटे भरता है और कई बार बस पकड़ने दौड़ भी लगा देता है. हर कहीं धड़ल्ले से घूमता है. ऐसे में शंका है कि कहीं विकलांग प्रमाण पत्र भी फर्जी तो नहीं?
शिक्षा को कलंकित करने वाले और निरीह आदिवासियों का पैसा हजम कर जाने वाले ऐसे लोग शिक्षा का कितना अलख जगा पाएंगे यह तो नहीं मालूम लेकिन इतना पता है कि फर्जीवाड़ा कर ऐसे लोग ही शिक्षा के मंदिर को कलंकित कर रहे हैं. अब तमाम तरह के संदेहों और प्रमाणित सत्यता के बाद भी यदि ऐसे फर्जीवाड़िये बच जाते हैं तो फिर जांच की आंच से झुलसन की उम्मीद किससे की जाए? वैसे यह सुकून की बात है कि फिलाहाल जिले में जहां कमिश्नर के तौर पर एक काबिल अधिकारी मौजूद हैं वहीं कलेक्टर भी प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त करने में रात-दिन जुडे हुए हैं. इसके अलावा इसका नियोक्ता आदिवासी विकास विभाग के उपायुक्त और सहायक आयुक्त भी ऐसे मामलों में गंभीरता बरते हैं अब देखना है यह है कि संभाग मुख्यालय में तमाम अधिकारियों की मौजूदगी के बाद भी शहडोल से सटे एक गांव में धड़ल्ले की जा रही धोखाधड़ी कब तक बेनकाब होती है?
( ए स्ट्रेेट एक्सप्रेस संवाददाता त्रिवेणी यादव द्वारा)
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