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MP: बैगा सम्मेलन की जाँच की आँच की चौंकाने वाली सच्चाई

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भ्रष्टाचार, corruption

शहडोल. मार्च 2018 के समाप्त होने के एक दिन पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का शहडोल के लालपुर में बैगा सम्मेलन सह विकास यात्रा में आगमन हुआ. कार्यक्रम न केवल सफल रहा बल्कि कुछ इतना कि बाद में कार्यक्रम की अनुगूँज इस तरह सुनाई दी कि सफलता के साथ-साथ आयोजन के नाम पर जबरदस्त भृष्टाचार भी हुआ. जैसा कि हर शिकायत पर होता है, यहाँ भी हुआ और आनन-फानन में जाँच कमेटी बिठा दी गई और तत्कालीन कमिश्नर ने अपने रिटायरमेण्ट से कुछ पहले दो अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया. इसके बाद निलंबन के खिलाफ एक अधिकारी जो कि खण्ड शिक्षा अधिकारी सोहागपुर एसपीएस चन्देल ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और उन्हें स्थगन भी मिल गया. 

लेकिन सवाल उससे भी बड़ा तथा चर्चाओं और सुर्खियों में रहा कि दरअसल पूरा मामला है क्या और पीछे का सच भी क्या है? चूँकि मुख्यमंत्री का कार्यक्रम था इसलिए बडी संख्या में भीड़ जुटनी ही थी और दूर दराज से आदिवासी बैगा सम्मेलन में भाग लेने आ रहे थे. उनके लिए खाना-पानी का इंतजाम होना था. लेकिन यह सब कुछ इतनी जल्दबाजी में हुआ कि कई जगह औपचारिकताओं को दरकिनार कर काम को अंजाम दिया गया. जाहिर है कुछ न कुछ चूक ऐसे कार्यक्रमों में हो ही जाती है वही यहाँ भी हुआ. दूर दराज से आए मेहमानों के लिए लंच पैकेट और पानी का इंतजाम किया गया जिसमें मार्च की बढ़ती गर्मी ने असर दिखाया और कुछ फुड सप्लायरों के खाने के पैकेट खराब हो गए. मामले को तूल पकड़ना ही था क्योंकि मुख्यमंत्री की यात्रा से जुड़ी घटना थी. शिकायतें हुईं फिर कार्रवाई भी हुई. लेकिन हकीकत में ऐसा लगता है कि जाँच हुई ही नहीं. प्रतिनिधि तक छनकर पहुँची खबरों से पता लगा कि दरअसल जाँच और गड़बड़ियों से अलग एकाएक सुर्खियों में आए सोहागपुर खण्ड शिक्षा अधिकारी को बलि का बकरा बना दिया गया. जबकि वास्तविकता की तह तक पहुँचने पर पता चलता है कि यदि अब भी बारीकी से जाँच हुई तो मामले की असलियत कुछ और होगी.
हकीकत यह है कि जिस भोजन के पैकेट और पानी की खरीदी को बिना किसी टेण्डर के भुगतान किए जाने को तूल दिया गया वह निराधार है क्योंकि रेट का निर्धारण कलेक्टर शहडोल के द्वारा ही किया गया था और उसी के हिसाब से भुगतान हुआ. अन्य आरोपों की बारीकियों में कच्चे खाद्यान्न की बिना जीएसटी भुगतान के लंबी खरीदी की भी खूब चर्चा रही. उक्त संबंध में पता चला है कि एकाएक इमरजेन्सी में खरीदी तो की गई लेकिन कुछ छोटी फर्मों के विक्रय की सीमा के अधीन बिल हैं उन्हें जरूर इसकी छूट रही होगी. लेकिन जो बड़ी खरीदी हुई उनका जीएसटी भुगतान विक्रेता ने किया तथा जिसका सबूत भी जाँच के दौरान खुद जीएसटी से संबंधित विभाग ने किया है. 
इस पूरे मामले में कुछ मजेदार तथ्य भी सामने आए कि लंच पैकेटों और पानी की बोतलों के बिलों को समिति ने प्रस्तुत किया जिसका सत्यापन खण्ड शिक्षा अधिकारी ने जरूर किया लेकिन लेकिन बिना उनके हस्ताक्षर के भुगतान कैसे हो गया? गौरतलब है कि बिल प्रस्तुतकर्ता समिति थी ऐसे में समिति के सदस्यों के बिलों का धड़ाधड़ भुगतान बिना खण्ड शिक्षा अधिकारी के हस्ताक्षर कई तरह के संदेहों को जन्म देता है. कुल मिलाकर मामला अपने आप में काफी उलझा प्रतीत होता है जबकि जो वास्तविकता अभिलेखों से उजागर होती है उससे पता चलता है कि जिस एपीएस चन्देल पर जो आरोप लगे हैं उसमें उनके द्वारा किसी भी प्रकार के बिल भुगतान पर हस्ताक्षर ही नहीं है.  
*कहीं ऐसा तो नहीं कि जल्दबाजी में हुए भुगतान में पूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई और बाद में ठीकरा किसी एक पर फोड़ बांकियों को पाक साफ बनाए रखने के चक्कर में ही सारा खेल हुआ हो. अब सच्चाई जो भी हो वह अलग मुद्दा है लेकिन कटघरे में एक अकेले अधिकारी का आना शुरू से ही कइयों के गले नहीं उतर रहा था. जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे मामले से धूल की गर्द हटती गई और एक नई सच्चाई सामने आ गई जिससे कि पूरी जाँच ही कटघरे में आ खड़ी हुई. जिस अधिकारी ने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए समिति बनाई वही कैसे संदेही बन गया? इतना ही नहीं पता तो यह भी चला है कि सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग, शहडोल के अधीन हुए इस भुगतान में इतनी जल्दबाजी हुई कि खण्ड शिक्षा अधिकारी, सोहागपुर की जानकारी में लाए बिना और उनके द्वारा बिलों पर टीप लिखे बिना ही भारी भरकम बिलों का भुगतान हो गया. जबकि जानकारी यह भी है कि जिस टीम को लंच पैकेट संबंधी काम देखना था उसके सदस्यों के द्वारा ही अपनी जेब से पहले रकम खर्च की गई और बिलों पर उक्त आशय संबंधी टीप भी लिखी गई और खुद ही अपनी जेब से सरकारी भुगतान कर काफी बाद में औपचारिकता पूरी करने के लिए भुगतान की गई राशि पर खण्ड शिक्षा अधिकारी की सहमति लेकर रकम प्राप्त की गई.*
ऐसे में सवाल यही है कि क्या उस समय खण्ड शिक्षा अधिकारी किसी गहरी साजिश का शिकार हुए थे या फिर उनके द्वारा ही गठित टीम के सदस्यों की नीयत साफ नहीं थी. कुल मिलाकर एक सफल कार्यक्रम में कुछ लोगों की छोटी सी गलती की सजा उसे मिले जिसका साजिश या चूक से दूर- दूर तक कोई वास्ता तक नहीं है कितना उचित है?
दरअसल मामला छः क्विंटल मिठाई या तीन क्विंटल नमकीन की हेराफेरी तथा पैकेटों की संख्या में बाजीगरी और पानी की बोतलों के फर्जी भुगतान से आगे का है. जिसमें इस मामले से अनजान अकेले अधिकारी पर ही उंगली उठाना बेहद चौंकाने वाला है जबकि सच्चाई यह है कि सारा कुछ इसके लिए गठित कमेटी को करना था और किया भी. यहाँ तक कि एडवांस भुगतान करना, सामग्री क्रय करना और पैकेटों के बनने की सतत निगरानी भी. ऐसे में दोष एक अकेले पर वह तब भी समझ के परे था और अब भी. सवाल यह है कि क्या लंच पैकेट के लिए विधिवत कमेटी गठित करना ही खण्ड शिक्षा अधिकारी को भारी पड़ क्या? एक बात तो है कि अक्सर बड़े-बड़े आयोजनों में एक अधिकारी पर ही तमाम जिम्मेदारियाँ मढ़ दी जातीं हैं ऐसे में अकेली जान और क्या-क्या करे काम के चक्कर का चक्रव्यूह कार्यक्रम के बाद किसी न किसी पर गिरता तो है. क्या खण्ड शिक्षा अधिकारी,सोहागपुर के साथ भी ऐसा ही हुआ?अब सारा मामला एक बार फिर हाई लेबल कमेटी की जाँच के पास है और देखना होगा कि जाँच कमेटी गहन छानबीन करके वास्तविक दोषियों तक पहुँचती है या फिर किसी अकेले को बलि का बकरा बनाकर मामले को बन्द करती है