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Navratri 2020, 8th Day of Navratri, Navratri Ashtami Tithi- कैसे करें नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर मां महागौरी की पूजा और उपासना?

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कैसे करें नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर मां महागौरी की पूजा और उपासना?Navratri 2020 8th Day, Navratri Ashtami tithi, Maa Mahagauri Puja Vidhi, Vrat Katha

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Man Durga, Maha Ashtami

कैसे करें नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर मां महागौरी की पूजा और उपासना?

Navratri 2020 8th Day, Navratri Ashtami tithi, Maa Mahagauri Puja Vidhi, Vrat Katha, Mantra, Maha Ashtami ka Shubh Muhurt: नवरात्र के 8 वे दिन यानी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को देवी महागौरी की आराधना की जाती है।

वैसे तो पूरा शारदीय नवरात्र भक्तों के लिए मां की साधना कर उनकी असीम अनुकंपा पाने का अवसर होता है, मगर इसमें भी महाष्टमी की तिथि (Mahashtami tithi)  सबसे महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह दिन करूणामयी मां महागौरी (Maa Mahagauri) को प्रसन्न करने का होता है, जो सहज अपने आशीर्वाद से सबकी झोली भर देती हैं. यह तिथि कल शनिवार, 23 अक्टूबर को है.‌ इसी दिन नवमी की पूजा भी होगी. कोरोना काल में यथासंभव हम पूजा में संयम बरतें, हर अहं भाव त्याग कर पूरी श्रद्धा के साथ मां महिषासुर मर्दिनी का वंदन करें कि महामारी के संकट से उबरने की मां हमें शक्ति प्रदान करें.

दुर्गा का आठवां स्वरूप हैं महागौरी 

दुर्गापूजा के आठवें दिन इन्हीं की पूजा-उपासना का विधान है. इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है. इनको उपासना से भक्तों के सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं. भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते. वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है, मां महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है. इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है. हमें मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए.
मान्यता है कि महागौरी गौर वर्ण की हैं. इनके तेज से संपूर्ण सृष्टि प्रकाशमान है. इनकी चार भुजाएं हैं. वाहन वृषभ है, इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे दाहिने हाथ में त्रिशूल है. ऊपरवाले बायें हाथ में डमरू और नीचे के बायें हाथ में वर-मुद्रा धारण है. इनको मुद्रा अत्यंत शांत है. इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गयी है ‘अष्टवर्षा भवेद गोरी।’ इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं, इसलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है.
कथानुसार, दुर्गा सप्तशती में शुभ निशुम्भ से पराजित होकर गंगा के तट पर जिस देवी की प्रार्थना देवतागण कर रहे थे, वह महागौरी हो हैं, देवी गौरी के अंश से ही कौशिकी का जन्म हुआ, जिसने शुम्भ निशुम्भ के प्रकोप से देवताओं को मुक्त कराया. यह देवी गौरी शिव की पत्नी हैं, यही शिवा और शाम्भवी के नाम से पूजी जाती हैं. अष्टमी पूजन से तमाम दुख दूर होते हैं और सुखों की प्राप्ति होती है.‌ महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं. इनकी उपासना से आतंजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. अतः इनके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करने चाहिए, अष्टमी तिथि साधना-उपासना का महापर्व है.

महागौरी को ऐसे मिला गौर वर्ण 

पुराणों में मा महागौरी की महिमा का परिवार व्याख्यान मिलता है ये मनुष्य की वृत्तियों को सत् की ओर प्रेरित करके असत् का विनाश करती है, हमे निष्काम भाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए

एक पौराणिक कथानुसार

एक बार भगवान भोलेनाथ बातों ही बात में मा पार्वती को देख कुछ ऐसा कह बैठे, जिससे देवी का मन आहत होता है और पार्वती जीतपस्या में लीन हो जाती हैं. वर्षों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती, तो उन्हें दूदते हुए महादेव उनके पास पहुंचते हैं. वहां पार्वती को देख कर आश्चर्यचकित रह जाते हैं. उनका रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चादनी के सामन श्वेत और फुद के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं.

एक अन्य कथानुसार

भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ गया. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धो देते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कातिमान गौर वर्ण की हो जाती है. तभी से इनका नाम गौरी पड़ा. महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी. शांत और मूदुल दिखती हैं. देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। 
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

मां महागौरी की पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि (Maa Mahagauri ki Puja ka Shubh muhurt aur Pooja vidhi)

तिथि और शुभ मुहूर्त हृषिकेश पंचांग के अनुसार-
सातमी: शुक्रवार, 23 अक्तूबर-दिन में 12:09 बजे तक. उपरांत अष्टमी प्रारंभ.
अष्टमी व नवमी शनिवार, 24 अकूबर को दिन में 11:27 बजे तक अष्टमी, तदोपरांत नवमी तिथि प्रारंभ. इसी दिन महाअष्टमी व्रत एवं महागौरी दर्शन, दुर्गानवमी तंत्र पूजा एवं होमादी.
व्रत पारण व दशहरा रविवार, 25 अक्तूबर को दिन में 11:14 तक नवमी. उपरांत दशमी तिथि प्रारंभ. प्रातः शरद नवरात्रि का पारण, धर्मसिंधु के अनुसार, शाम के समय विजय मुहूर्त में दशमी तिथि होने से इसी दिन दशहरा पर्व मनाना चाहिए. सोमवार, 26 अक्तूबर को दिन में 11:33 तक दशमी.
अष्टमी को नारियल दान में देने का विधान है. मान्यता है कि मां को नारियल का भोग लगाने से नि संतानों की मनोकामना पूरी होती है. अष्टमी को विविध प्रकार से भगवती जगदेवा का पूजन कर रात्रि को जागरण करते हुए भजन, कीर्तन करें तथा नवमी को विधिपूर्वक पूजा-हवन कर 9 कन्याओं को भोजन कराना चाहिए.
लेखक- पं श्रीपति त्रिपाठी

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