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धरती पर स्वर्ग का एहसास कराता सिक्किम

सिक्किम की सुंदरता देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से उसे संजाया-संवारा है। सिक्किम की राजधानी गंगटोक के अलावा छांगु लेक सैलानियों के आकर्षण के केंद्र हैं

धरती पर स्वर्ग का एहसास कराता सिक्किम

poster on sikkim dharti ka swarg

सिक्किम की सुंदरता देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से उसे संजाया-संवारा है। सिक्किम की राजधानी गंगटोक के अलावा छांगु लेक सैलानियों के आकर्षण के केंद्र है।

पूर्व-उत्तर भारत की सात बहनों की पड़ोसन सिक्किम कुदरत की एक अनोखी देन है। ऊंची-ऊंची पर्वत श्रृंखला, नदियों में दूर-दूर तक दिल्ली स्फटिक की तरह झक सफेद बर्फ की चादर, आवारा घूमते बादल, पेड़ और हरीतिमा की चादर ओढ़े पर्वत, पहाड़ की ऊंचाई से झर-झर झरता झरना, किसी नागिन-सी बलखाती नदी की टेढ़ी-मेढ़ी धारा सिक्किम को वह प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करता है जो दिलो-दिमाग को सुकून पहुंचा दे। प्रकृति ने सिक्किम को ऐसा रूप दिया है कि इसे ‘पृथ्वी का स्वर्ग कहा जाता है।

Sikkim photo

सिक्किम की राजधानी गंगटोक के निकटतम हवाई अड्डा बागडोगरा से सड़क मार्ग द्वारा गंगटोक जाने की राह में रामपुर का पुल एक ऐसी विभाजक सीमा के रूप में आता है जो सिक्किम को पश्चिम बंगाल से अलग करता है। इसी पुल के आधे हिस्से से सिक्किम शुरू हो जाता है बागडोगरा से गंगटोक तकरीबन चार से पांच घंटे में पहुंचा जा सकता है।

अन्य देशों की सीमाओं से जुड़ा है सिक्किम 

पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी और जलपाईगुड़ी निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। सिक्किम में रेल लाइन नहीं है। भारत के 22वें राज्य सिक्किम के उत्तर में तिब्बत, पश्चिम में नेपाल, पूर्व में भूटान और दक्षिण में पश्चिम बंगाल हैं। चार जिलों में बंटा सिक्किम 15 मई, 1975 को भारत का पूर्ण राज्य बना। सिक्किम की लगभग साढ़े पांच लाख की जनसंख्या में मुख्य रूप से लेप्चा, भूटिया और इनसे मिलती-जुलती नस्लों के लोगों के साथ नेपाली भी हैं।




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यह एक कृषि प्रधान राज्य है जहां की 64 प्रतिशत जनसंख्या खेती में लगी है। पूर्वोत्तर के सभी सात राज्यों की तुलना में सिक्किम का क्षेत्रफल और जनसंख्या सबसे कम है लेकिन प्रकृति ने इस राज्य को अद्भुत नियामतें सौंपी हैं। राजधानी गंगटोक पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। अप्रैल-मई में जब मैं सपरिवार गंगटोक पहुंचा तो भारी बर्फबारी ने मेरा स्वागत किया। बर्फ इतनी पड़ी कि मकानों के सामने और सड़कों के किनारे बर्फ की एक मोटी परत-सी जम गई जो 48 घंटे के बाद भी पूरी तरह नहीं पिघली। सप्ताह भर की यात्रा में गंगटोक के अलावा छांगु लेक और युमथांग भी जाना हुआ।

सिक्किम की जलवायु सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती

गंगटोक घूमने के लिहाज से अप्रैल-मई का मौसम सबसे मुफीद और सुहाना है। इस समय यहां का तापमान 20 डिग्री के आस-पास बना रहता है। थोड़ी-बहुत बारिश भी होती रहती है। सबसे खास बात यह कि इस समय आकर्षक फूल रोडे डेनडे के खिलने का समय होता है।
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गंगटोक के बलुआखानी क्षेत्र में टैक्सी स्टैंड है जहां से गंगटोक और बाहर के लिए टैक्सी किराए पर ली टैक्सी शेयर करने से किराए की बचत हो जाती है। एक दिन में गंगटोक तथा सकती है। आसपास के मुख्य दर्शनीय स्थलों को देखा जा सकता है। आमतौर पर गंगटोक और आसपास के नौ-दस दर्शनीय स्थल ऐसे हैं जिसे हर टैक्सी वाला अवश्य दिखाता है। इनमें शामिल है हनुमानटोक, गणेशटोक, छोर्तेन, रांका मॉनेस्ट्री, रोप-वे, म्यूजियम ऑफ तिब्बतोलॉजी, फ्लावर शो, स्टेट गवर्नमेंट हैंडीक्राफ्ट शॉप तथा बनजाकरी वाटर फॉल । पर्यटक चाहे तो गंगटोक से 24 किलोमीटर दूर रामटेक मॉनेस्ट्री भी जा सकते हैं। बलुआखानी के पास किसी भी ऊंची जगह से हिमालय पर्वतमाला की तीसरी सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा (8,579 मीटर) की बर्फाच्छादित चोटी धूप खिलने से पहले अच्छी तरह देखी जा सकती है। वैसे कंचनजंगा को देखने के लिए खास तौर पर ताशी व्यू प्वाइंट बना हुआ है। वहां से इस खूबसूरत पर्वत शिखर को अपनी आंखों और अपने कैमरे में आराम से कैद किया जा सकता है। डियर पार्क और इपेकाक गार्डन पशु और वनस्पति प्रेमियों के लिए दर्शनीय स्थल हैं। शहर और पूरे सिक्किम में आर्किड के फूल बहुतायत में देखने को मिलते हैं।

गंगटोक के एम.जी. मार्ग को प्राप्त है सबसे साफ-सुथरा मार्केट दर्जा 

गंगटोक का मुख्य बाजार एम.जी. मार्ग पर स्थित है जहां शाम ढले जाना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। ऐसा मुंदर और साफ-सुथरा मार्केट दिल्ली में भी कहीं देखने को नहीं मिलता। यहां खगीदारी के अलावा खाने पीने और रहने-ठहरने की भी अच्छी सुविधा है।
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सिक्किम दुरिजम का आफिस इसी बाजार में है। इससे सटे लाल बाजार में खरीदारी अपेक्षाकृत सस्ती है। ये बाजार पर्यटकों और खरीदारों से हमेशा भरे रहते हैं। शहर आमतौर पर साफ सुथरा है। प्रशासन द्वारा पॉलीथिन के इस्तेमाल पर पाबंदी है। सड़क पर और बाजार में लड़कियां एवं महिलाएं अधिक दिखती है वे दुकान चलाती हुई भी दिखेंगी तो पुलिस यूनिफॉर्म में भी । वे आधुनिक परिधानों में भी होती है तो परंपरागत परिधानों में भी लोगों की तरह यहां के मकान भी आधुनिक और परंपरागत दोनों ही रूपों में हैं। हाथ में घूमते चक्र लिए लामाओं के झुंड कहीं भी दिख सकते हैं। सड़क किनारे बौद्ध प्रतीक, मनी छोकोर, यत्र-तत्र दिखाई देते हैं। शहर में मठ और पैगोडा के अलावा मंदिर, चर्च और मस्जिद भी हैं, यानी सर्वधर्म समभाव की जीती-जागती मिसाल है गंगटोक। शहर हो या निर्जन पहाड़ रण बिरंगे पताके सिक्किम की खास पहचान या प्रतीक के रूप में सर्वत्र दिखाई देते हैं।




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शहर में टैक्सी, वैन और जीप यातायात के मुख्य साधन है । सड़कें अधिक चौड़ी नहीं है और हर कहीं ढलान या उठान उन्मुख होती है। शहर को शहर बनाने वाले सारे संस्थान-प्रतिष्ठान यहां भी हैं जैसे, बैंक, एटीएम, स्कूल, कॉलेज, रेडियो व दूरदर्शन केंद्र, ऑफिस, होटल और बाजार आदि । गंगटोक में निर्माणाधीन ‘कंचनजंगा टूरिस्ट विला’ अगले साल से यहां आने वालों के लिए शायद सर्वाधिक पसंदीदा जगह बनने वाला है। इस विला में आधुनिकता और परंपरा का अद्भुत समय है। इसकी संरचना और वास्तुकला अपूर्व है।

झील के चारो ओर  बर्फ से तंके पहाड़

गंगटोक से लगभग 35 किलोमीटर दूर कागु लेक है। यहां स्कॉर्पियो या बोलेरो जैसे रफ-टफ वाहनों से जाया जाता है। यहां पहुंचने में अमूमन दो घंटे लग आाते है। समुद्रतल से 12,400 फुट की ऊंचाई पर स्थित झील के च बर्फ से तंके पहाड़ है। रास्ते में बादल आपके संगी-साधी बने रहते हैं या तो आपके देह से लिपटने को आतुर या फिर तफरीह पर निकलने से पहले बाय-बाय करते हुए। आईटीबीपी के जवान इस ऊंचाई पर भी सीमा के सजग प्रहरी की तरहं मौसम की तमाम दूर परियों और पेड़ों को सहते हुए अपना कर्तव्य निभाते हैं। जगह-जगह चेक प्वाइंट भी मिलते हैं।
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पिछले बर्फ से बने छांगु लेक का पानी बहुत ठंडा होता है। यहां पर्वत का ऊंट’ कहे जाने वाले जानवर याक की पीठ पर बैठकर या तो फोटो खिंचवा सकते हैं या फिर यदि जेब अधिक ढीली करनी हो तो इसकी सवारी का मजा भी ले सकते हैं। चाय-कॉफी पीने के अलावा मोमो व चाउमिन आदि खाद्य की भी सुविधा इस ऊंचाई पर उपलब्ध है मोमो सिक्किम का संभवतः सर्वाधिक पसंदीदा खाना है। यहां पहाड़, बर्फ, बादल, झील, ताजा हवा यानी प्रकृति को एकदम निकट से देखने, महसूस करने और आनंद उठाने का अबसर है। छांगु से 20 किलोमीटर आगे मेनमेचो लेक । यह रांपोचू नदी का उद्गम स्थल है। नदी रांगपो में जाकर तीस्ता नदी से मिलती है। छांगु से ही आगे की यात्रा नाथुला दर्रे (पास) तक पहुंचा सकती है। यह भारत-चीन की सीमा भी है नाथुला दर्रा बंद होने की वजह से हमें वहां जाने का अवसर नहीं मिला।

मुख्य आकर्षण ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’

गंगटोक से युमथांग 141 किलोमीटर दूर है। युमथांग की यात्रा यद्यपि लाचुंग में एक रात के पड़ाव के बाद पूरी होती है लेकिन अगली सुबह जब आप युमथांग पहुंचते हैं तो रास्ते की तमाम थकावट और दुश्वारियां मानो उड़न छू हो जाती हैं। दरअसल, गंगटोक से मंगन, चुंगथांग, लाचुंग होते हुए युमथांग की यात्रा अच्छे अच्छों को भी थका देती है लेकिन तमाम रास्ते प्रकृति के जो अद्भुत नजारे दिखाते है वे इस थकान को अधिक देर तक रहने नहीं देते।
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रास्ते में यूं तो कई जलप्रताप देखने को मिलते हैं लेकिन ‘सात कन्या झरना’ की बात ही कुछ और है। यहां सभी पर्यटक जरूर रुकते हैं और इसके सौंदर्य को निहारते हैं । युमथांग के रास्ते में जो सर्वाधिक मनोहारी नजारा देखने को मिलता है वह है फूलों की घाटी का नजारा । दरअसल, युमथांग जाने वालों का मुख्य आकर्षण ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ ही होता है। यहां रोडोडेनडून यानी बुरांस नामक खास तरह के पौधे पाए जाते हैं जिनमें अप्रैल-मई के महीनों में जब फूल खिलते हैं तो लगता है मानो पृथ्वी रूपी कैनवस पर स्वयं प्रकृति ने कूची चलाकर एक अनुपम, अद्भुत व अविस्मरणीय पेंटिंग बना दी हो। रोडोडेन्ड्रन फूल की अलग-अलग मनभावन रंगों की लगभग 30 किस्में पाई जाती हैं । फूलों की यह घाटी इस मायने में और भी खूबसूरत हो जाती है कि पूरे क्षेत्र में पथरीली जमीन का एक लंबा-चौड़ा मैदान जैसा है जो एक प्रकार से चरागाह भी है। दरअसल, यहां याक बहुतायत में मिलते हैं । फूलों की घाटी को छोड़कर गंगटोक से युमथांग की यात्रा में एक ओर ऊंचे पर्वत होते हैं तो दूसरी ओर गहरी खाई। फूलों की घाटी का निचला हिस्सा अंततः लाचुंग नदी का किनारा बन जाता है। यही नदी आगे चलकर तीस्ता नदी के नाम से जानी जाती है।

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यात्रा के रास्ते में सीढ़ीदार खेतों के दृश्य आम होते हैं। पहाड़ की इतनी ऊंचाई पर भी जगह-जगह स्तूप, छोटे मोटे मंदिर व उपासना स्थल आदि हैं। लगभग 13,000 फुट तक की बर्फीली ऊंचाइयों पर भी मानव बस्तियों को देखना मनुष्य की जीवटता और जिजीविषा का ही प्रमाण है । बादलों के घर पर भी डाकिये को डाक लाते-ले जाते देखना ऐसा लगता है मानो इन डाकियों का भगवान के घर भी आना-जाना होता होगा। पहाड़ की इन दुर्गम ऊंचाइयों पर भी डाकघर, स्कूल और हॉस्पीटल देखकर खुशी के साथ-साथ मन को सुकून-सा मिलता है।

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