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दोआब (Doab) किसे कहते हैं? और जानिए भारत के दोआब क्षेत्रों के बारे में

दोआब (Doab) किसे कहते हैं? और जानिए भारत के दोआब क्षेत्रों के बारे में




















Doab

दो नदियों के बीच के इलाके को दोआब (Doab) कहा जाता हैं। जानिए भारत के दोआब क्षेत्रों के बारे में

भारत के मुख्य दोआब (Main doab of india) व्यास एवं सतलज के बीच का बिस्त-जालंधर दोआब (Bist-Jalandhar Doab), व्यास एवं रावी के बीच का बारी दोआब (Bari doab), रावी एवं चेनाब के बीच का रचना दोआब (Rachna Doab), चेनाब एवं झेलम (Jhelum) के बीच का चाज दोआब (Jech Doab), झेलम-चेनाब एवं सिंधु के बीच का सिन्ध सागर दोआब (Sindh Sagar Doab)।

उत्तरी मैदान में नदी मार्गों ने जलोढ़ राशि को तोड़कर अपने लिए पार्श्व में वप्र जिन्हें स्थानीय निवासियों की भाषा में धाया कहते हैं। शिवालिक की पहाड़ियों में बड़ी संख्या में खड्डे मिलते हैं। इन खड्डों को वहां के लोग ‘चो’ कहते हैं।

गंगा का मैदान

गंगा का मैदान उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल तक विस्तृत है। इसका डेल्टाई विश्व में सबसे बड़ा डेल्टा है। गंगा तथा इसकी सहायक नदियों की निपेक्ष क्रिया द्वारा यह मैदान बना है। दक्षिण पठार से निकलने वाली नदियों (चम्बल, बेतवा, केन तथा सोन) ने भी इस मैदान के निर्माण में अपना योगदान दिया है। इस संपूर्ण मैदान की सामान्य ढाल पूर्व तथा दक्षिण पूर्व की ओर है।

गंगा यमुना दोआब (Ganga-Yamuna Doab)

रुहेलखण्ड तथा अवध इस मैदान की तीन प्रसिद्ध इकाइयां हैं। यहां पर जलोढ़ों की मोटाई 1000 मीटर से 2000 मीटर है। आस-पास के क्षेत्र से ये 15 से 30 मीटर ऊंचे होते हैं। स्थानीय भाषा में खोल्स कहलाते हैं। ऊपरी गंगा दोआब (Upper Ganga Doab) में कहीं-कहीं वातिक भूड़ भी मिलते हैं। इनमें भूड़ नामक विशेष प्रकार की मिट्टी का निर्माण हुआ है। बिहार में उत्तर से आने वाली अनेक नदियों ने पंखानुमा शंकुओं का निर्माण कर दिया है।


ब्रह्मपुत्र नदी का मैदान

असम में धुबरी में सदिया तक एक कोने से दूसरे कोने के बीच ब्रह्मपुत्र नदी का मैदान है। इस उत्तरी मैदान के निम्नलिखित चार विभाजन भी उल्लेखनीय है

भाबर प्रदेश

यह शिवालिक के गिरिपद प्रदेश में सिंधु नदी से तीस्ता नदी तक पाया जाता है। 8 से 16 किलोमीटर चौड़ाई वाली एक संकरी पट्टी के रूप में यह स्थित है। गिरिपद पर स्थित होने के कारण इस क्षेत्र में नदियां बड़ी मात्रा में भारी पत्थर, कंकड़, बजरी आदि लाकर जमा कर देती हैं। इस क्षेत्र में अनेक छोटी-छोटी नदियां, भूमिगत होकर अदृश्य हो जाती है

तराई प्रदेश

कहां पर अधिकांश भाग दलदली होता है। नदियों द्वारा विशेष जलोढ़ भाग भावर प्रदेश की अपेक्षा छोटे होते हैं। अधिक दलदल तथा नमी के कारण यहां पर घने वन तथा विभिन्न प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं। भावर प्रदेश की लुप्त नदियां यहां फिर से भूतल पर प्रकट हो जाती हैं।

बांगर प्रदेश

बांगर वह ऊंचा भाग है जो पुरानी जलोढ़ मिट्टी द्वारा बना हुआ है। 

खादर प्रदेश

खादर प्रदेश नीचा भाग है जहां नदियों की बाढ़ का जल प्रति वर्ष पहुंचता है। नदियों की बाढ़ का जल प्रति वर्ष नई मिट्टी लाकर विछा देता है। यहां पर गहन कृषि की जाती है।

प्रायद्वीपीय पठार

भारत का प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश एक त्रिभुजाकार आकृति का निर्माण करता है जिसका आधार दिल्ली एवं राजमहल की पहाड़ियों के बीच उत्तरी मैदान की दक्षिणी सीमा तथा शीर्ष कन्याकुमारी है। वह पठार भारत का प्राचीनतम भू- खण्ड है जिसकी समुद्र तल से औसत ऊंचाई 600 से 900 मीटर है। यह पठारी भाग तीन ओर से पर्वतों द्वारा घिरा हुआ है। इसके उत्तर में अरावली. विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियां, पश्चिम में पश्चिमी घाट तथा पूर्व में पूर्वी घाट स्थित है। उत्तर से दक्षिण की ओर इसकी लम्बाई 1600 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम की ओर इसकी चौड़ाई 1400 किलोमीटर है। नर्मदा तथा ताप्ती की संकरी घाटियों ने इसे दो समान भागों में बांट रखा है। उत्तरी भाग को मालवा का पठार तथा दक्षिणी भाग को दक्षिण का मुख्य पठार दक्कन ट्रैप कहते हैं


मालवा का पठार

नर्मदा तथा ताप्ती नदियों तथा‌‌ विन्ध्याचल पर्वत के उत्तर पश्चिम में त्रिभुजाकार में फैला‌ हुआ है। यह ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों से बना हुआ है।‌ ‌इसकी ऊंचाई लगभग 800 मीटर है। इसका सामान्य ढाल उत्तर-पूर्व दिशा में है। इसलिए इस पठार में बहने वाली नदियां उत्तर पूर्व में प्रवाहित होकर यमुना नदी में जा मिलती हैं। इन नदियों के प्रवाह के कारण यह पठार अनेक स्थानों पर उबड़ खाबड़ बन गया है। चम्बल नदी द्वारा निर्मित चम्बल घाटी एक विस्तृत क्षेत्र में बीहड़ के रूप में प्रसिद्ध है। बुन्देलखण्ड, रूहेलखण्ड तथा छोटा नागपुर इस पठार के पूर्वी विस्तार है।

दक्षिण का मुख्य पठार (दक्कन ट्रेप)

यह ताप्ती नदी के दक्षिण में त्रिभुजाकार रूप में फैला हुआ है। उत्तर- पश्चिम में सतपुड़ा एवं विंध्याचल, उत्तर में महादेव तथा मकालू, पूर्व में पूर्वी घाट तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट इसकी सीमाएं बनाते हैं। दक्कन ट्रेप (Deccan Traps) मुख्यतः लावा से बना हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 600 मीटर है। लगभग दो लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस विशाल पठार की ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। पश्चिम घाट दक्षिणी पठार की पश्चिमी सीमा बनाता है। इसे सह्याद्रि पर्वत भी कहते हैं। यह उत्तर में ताप्ती नदी की घाटी से दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैला है। इसकी लंबाई लगभग 1500 किमी है और इसकी चौड़ाई उत्तरी भाग में लगभग 50 किमी तथा दक्षिणी भाग में 80 किमी है। इसकी औसत ऊंचाई 900 से 1100 मीटर है। यह पूर्व उत्तर से दक्षिण दिशा में एक दीवार की भाँति खड़ा है। इसमें कुछ दरें हैं जिनके द्वारा इस पर्वत को पार किया जा सकता है। उत्तर से दक्षिण की ओर इन दरों के नाम हैं, थालघाट, भोरघाट, पालघाट तथा शेनकोटा। इन दरी का प्रयोग रेल मार्गों के लिए भी किया जाता है।
थालघाट में से मुम्बई-कोलकाता, भोरघाट में से मुम्बई चेन्नई तथा प्लान में से कोच्चि-चेन्नई रेलमार्ग गुजरते हैं। यह पर्वत पश्चिमी ढलान की ओर सीढ़ियों के रूप में है, इसलिए इसे घाट कहते हैं। इसके दक्षिणी भाग में कई पहाड़ियां हैं, जिनमें नीलगिरि, अन्नामलाई, पालनी तथा इलायची की पहाड़ियां प्रसिद्ध हैं। पालनी पहाड़ियों में स्थित अनाईमुडी दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी है, जिसकी ऊंचाई 2,695 मीटर है। नीलगिरि में स्थित दोदाबेटा का दूसरा स्थान है, जिसकी ऊंचाई 2,637 मीटर है। इलायची की पहाड़ियों में इलायची बहुत होती है। इसलिए इन्हें इलायची की पहाड़ियां कहा जाता है। 
पूर्वी घाट दक्षिणी पठार के पूर्वी किनारे पर स्थित है। यह ओडिशा के उत्तर पूर्वी भाग से आरम्भ होकर बंगाल की खाड़ी के समानान्तर चलता हुआ नीलगिरि की पहाड़ियों तक पहुंचता है। इसकी चौड़ाई उत्तर में 200 किलोमीटर तथा दक्षिण की ओर 100 किलोमीटर है। इसकी औसत ऊंचाई 600 मीटर है। इसे विभिन्न भागों में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इनमें नल्लामलायी, वेलीकोंडा, पालकोंडा, जावदी, शेवराय प्रमुख नाम है। दक्षिण में यह नीलिगिरि की पहाड़ियों के निकट पश्चिमी घाट के साथ मिल जाता है।
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