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जानिए बिहार के बारे में

जानिए बिहार के बारे में

About Bihar

बिहार की भौगोलिक स्थिति

बिहार 21°77 उत्तरी अक्षांश से 27°31′ उत्तरी अक्षांश व 83°20′ से 88°17′ पूर्व देशान्तर के मध्य स्थित है। इसकी परिस्थितियां इसे तीन प्राकृतिक इकाइयों में विभक्त करती हैं। राज्य के पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश, दक्षिण में झारखण्ड एवं उत्तर में अलग देश नेपाल है।

तराई क्षेत्र

यह भाग हिमालय पर्वत श्रृंखला की शिवालिक श्रेणी का हिस्सा है। यह पश्चिम चंपारण जिले के उत्तरी भाग में 32 किमी. लंबे और 6.8 किमी. चौड़े क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक भारत-नेपाल सीमा के समानांतर है। यह पर्वत क्षेत्र सुमेश्वर एवं दून नामक दो पर्वतमालाओं से मिलकर बना है। जिन्हें हरहा नदी पृथक करती है। 32 किमी. लंबी तथा 7 किमी. चौड़ी सुमेश्वर दून पर्वतमाला इसकी उत्तरी श्रेणी बनाती है।

मैदानी इलाका

बिहार का मैदानी भाग प्रदेश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 42 प्रतिशत हिस्से में फैला है। दक्षिण में 150 मी. की समोच्च रेखा तथा उत्तर में तराई क्षेत्र को छोड़कर भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा का सीमांकन करती है।

छोटा नागपुर पठार

बिहार के मैदानी क्षेत्र के ठीक दक्षिण में 150 मी. की समोच्च रेखा इसका आरंभ है। रोहतास की कैमूर पहाड़ी के अलावा सारा क्षेत्र छोटा नागपुर पठार के अंतर्गत आता है। यह उत्तरी-पूर्वी भारत की ओर फैले प्रायद्वीपीय भारत का ही एक हिस्सा है। यहां की चट्टानों को कैम्ब्रियन पूर्व युग का माना जाता है। पश्चिम का पाट एवं पूर्व में राजमहल पहाड़ी ज्वालामुखी के लावे के जमाव का परिणाम है। बिहार में गंगा, गंडक, सोन,‌ बागमती, कोसी, घघरा,‌ दामोदर एवं महानदी सहित अन्य प्रमुख नदियां हैं।

बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बिहार भारत की प्राचीन सभ्यता का समृद्ध केन्द्र है। यह राज्य चंद्रगुप्त मौर्य व सम्राट अशोक से संबंधित रहा है। सम्राट अशोक के समय मगध में 19 हजार बौद्ध विहार थे। इन्हीं की वजह से इसे बिहार कहा जाता है। यहां भगवान महावीर तथा बुद्ध से संबंधित कई स्थल हैं। सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गोविन्द सिंह का जन्म पटना में हुआ। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर का जन्म पटना जिले के कुंडलपुर ग्राम में हुआ था। प्राचीन भारत के शक्तिशाली मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र यानी आज का पटना थी। 12 दिसम्बर, 1911 को संयुक्त बिहार और उड़ीसा के प्रावधानों को बदलकर 1936 में बिहार को राज्य बनाया गया था। बिहार का वर्तमान स्वरूप 1 नवंबर 1956 में उदय हुआ। सन् 2000 में इसमें से झारखण्ड को अलग प्रांत बनाया गया।

राज्य की आर्थिक स्थिति

बिहार में चावल, गेहूं, गन्ना, मक्का, जौ, बाजरा, जूट एवं चना सहित अन्य फसलें उत्पादित की जाती हैं। वहीं लौह-इस्पात, एल्यूमीनियम, तांबा, जस्ता, इंजीनियरिंग, रसायन, मोटरगाड़ी, सूती वस्त्र, चीनी, रेशम, जूट, तम्बाकू, उर्वरक, तेल-शोधक, कोयला उद्योग हैं। खनिजों में लौह अयस्क, मैंगनीज, कोयला, क्रोमियम, यूरेनियम, वेनेडियम, बॉक्स तांबा, सोना, टिन, सीसा, थोरियम, चीनी मिट्टी, फेल्सपार ग्रेफाइट, सोपस्टोन, सपेटाइट, अभ्रक, चूना-पत्थर, गंधक डोलोमाइट, केयोनाइट, एस्बेस्टस खनिज पाए जाते हैं। य अभ्रक का देश में सर्वाधिक 54.8 प्रतिशत तथा कोयले का 34.8 प्रतिशत उत्पादन होता है।

राज्य के लिए परिवहन

राज्य में करीब 76,065 किमी. लंबी पक्की सड़कें है। इनमें लगभग 3,537 किमी. राष्ट्रीय राजमार्ग व 17,898 किमी. प्रांतीय राजमार्ग हैं। यहां रेलपथ की लंबाई 3,377 किमी. से अधिक है। इसमें ब्राडगेज 2,142 तथा मीटरगेज 1,235 किमी. है। सबसे बड़ा नदी पुल गांधी सेतु है। हवाई अड्डे पटना व बिहटा में है। जलमार्ग की लंबाई 900 मील है।

यहां के त्योहार

बिहार राज्य में अनेक त्योहार मनाए जाते है। छठ पूजा त्योहार में यहां के निवासियों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। यह साल में दो बार (चैत्र और कार्तिक) मनाया जाता है। अन्य राज्यों में रहने वाले बिहार के लोग भी इसे बड़ी धूमधाम से मनाते है। बिहूला भी प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो भागलपुर क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। अन्य प्रमुख त्योहारों में बसंत पंचमी, शिवरात्रि, रक्षा बंधन, होली, दुर्गा पूजा, दीपावली आदि मनाए जाते हैं। मुस्लिम और ईसाई धर्मों के मानने वाले भी ईद, ईद-उल-जुहा और क्रिसमस आदि मनाते है।

बिहार के पर्यटन स्थल

पटना– इस शहर की स्थापना का श्रेय शेरशाह सूरी को जाता है, जिसने मुगल सम्राट हुमायूँ को हराया था। यह शहर पहले पाटलिपुत्र के नाम से भी जाना जाता था। गांधी संग्रहालय देशी-विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का स्थान है। यहां गांधीजी के जीवन दर्शन से संबंधित सभी दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह है। पटना स्थित गोलघर लगभग 214 वर्ष पुराना है। बिना किसी स्तम्भ का बना यह गोलाकार अद्भुत भवन अन्न संग्रह के उद्देश्य से बनाया गया था कुम्हरार, जो कि अस्सी खंबों वाला सभा भवन है। इन खम्बों को एक ही पत्थर से काट कर बनाया गया था, भी देखने लायक है। अन्य दर्शनीय स्थलों में संजय गांधी जैविक उद्यान, शहीद स्मारक, मीतनघाट दरगाह शरीफ, बांकीपुर क्लब, मौर्यालोक आदि हैं। यहां खुदाबख्श लाइब्रेरी भी है, जहां 18 हजार पांडुलिपियां संरक्षित हैं। ये पांडुलिपियां अरबी, फारसी, उर्दू, तुर्की एवं पश्तू भाषा में हैं, जिनमें चिकित्सा, कला, विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र आदि का ज्ञान छिपा है।
गया-प्राचीन काल में गया मगध साम्राज्य का एक अंग था। ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से गया का विशेष महत्व रहा है। यहां घूमने के लिए कई महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल हो। गया की खूबसूरती का राज उसके चारों और पर्वतों की श्रृंखला है।
गया में कई तालाब हैं जो जिले को सुंदर बनाते हैं, पर सूर्यकुण्ड का अलग महत्व है। यह मगध का सबसे पुराना तलाब है। गया जिले में विष्णुपद मंदिर फल्गु नदी के किनारे बना है इस मंदिर में साक्षात भगवान विष्णु के 13 इंच के पद चिन्ह हैं। इसके अलावा यहां, सीता कुण्ड, मातृयोनि गुफा, कवली‌‌ देवी का मंदिर आदि दर्शनीय स्थल हैं।
बोधगया-निरंजना नदी के तट पर बसा बोधगया अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल है। रमणीय पर्वतीय भू-भाग, निर्मल जलवाहिनी नदियां, सघन कमलदलों से आच्छादित सरोवर, सघन वन, उपवन आदि मनःप्रसादक दृश्यावलियों से युक्त यह स्थल प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है।
राजगीर– पहाड़ियों से घिरा विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल राजगीर अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए खासा आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। प्राचीन काल में सम्राट जरासंध ने अनेक प्रतिद्वंद्वी राजाओं को परास्त कर राजगीर दुर्ग में बंद कर रखा था। 28 दिनों तक चले मल्लयुद्ध में भीम ने जरासंध के दोनों पैर चीर कर मार डाला था। राजगीर जिन पांच पहाडियों से घिरा हुआ है, उन्हें पंचपहाडी के नाम से जाना जाता है। ये करीब एक हजार फीट ऊंची हैं वैभार, विपुलाचल, रत्नागिरि, उदयगिरि और सोनारगिरि के नाम से ये मशहूर हैं। यहां के अन्य दर्शनीय स्थलों में गर्म जल के झरने, जरासंध का अखाड़ा, विश्व शांति स्तूप, बिंबिसार का जेल, मनियार मठ, सप्तवर्णी गुफा, वेणुवन और आकर्षक संग्रहालय वीरायतन हैं।
महाबोधि मंदिर– यहां का महाबोधि मंदिर उत्तर भारत के अन्य मंदिरों की तुलना में अद्वितीय और बेमिसाल है। यह बोधि वृक्ष एवं वज्रासन के पूरब दिशा में सटा है। यह मंदिर 170 फीट ऊंचा, बहु अलंकृत पेगोडानुमा बना हुआ है। महात्मा बुद्ध को जिस वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी- वह बोधि वृक्ष भी यहीं है, जिसे दूर-दूर से देखने लोग आते हैं। यहां के अन्य दर्शनीय स्थलों में अजपाल का वटवृक्ष, अलौकिक वृक्ष, मुचलिन्द सरोवर, अशोक पिलर व मनौती दीप केंद्र प्रमुख हैं।